बुधवार, 12 सितंबर 2018

हम थोड़े से हैं...........

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हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल।
वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल।


हम दखल जो देते रहें हैं तुम्हारी हर बात पे,
ऐसे तो नहीं कर सकता मैं कभी तुम्हे हासिल।


कसम से न आऊंगा दुबारा लौटकर तुम्हारी ज़िन्दगी में,
सिर्फ कर लो अपने दिल में मुझे जरा सा शामिल।


मुझे हर गुनाह क़बूल अब सजा दो तुम मुझे,
दिन में खाता हूं ठोकरें बिन तुम्हारे रात है बोझिल।


तुम्हारी वफाओं की सुनानी है कहानी "ख़ामोश" जहाँ को,
सामने आ जाओ तुम यार एक बार बन के मेरे कातिल।
..............................................................................
                     अमित कुमार ख़ामोश

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

सोचता हूँ कि......

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सोचता हूँ कि उनसे इश्क का इजहार कर दूँ,
अपनी मुहब्बत में उनको बेकरार कर दूँ।
कब का छोड़ दिया मैंने करना कत्ल वरना,
मैं तो निगाहों से शिकार कर दूँ।
..............................................................
            अमित कुमार ख़ामोश

बुधवार, 5 सितंबर 2018

वो कहते हैं कि उनके.................

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वो कहते हैं कि उनके बिना हम नहीं जी पाएंगे।
हम वो हैं कि जहर शराब में मिलाकर पी जाएंगे।

हम हुए सबके सामने साबित गुनेहगार तो,
बनकर गवाह अदालत वो भी जाएंगे।

थका सा चाँद बुझी रोशनी बोझिल सी ये रात,
कह दो आ जाएं वो तो चिराग़ फिर जी जाएंगे।

मंजूर नहीं हमको जो सज़ा ज़माने ने मुझे दे दी,
कराने कत्ल हम उनकी नज़रों के सामने ही जायेंगे।

छोड़ दो साथ गम न होगा "ख़ामोश" दिल को मगर,
दोस्त समुन्दर को अपनी आंखों का दे पानी जाएंगे।
................................................................................
            अमित कुमार ख़ामोश

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

वो मेरे दर्द की इंतिन्हा..................

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वो मेरे दर्द की इंतिन्हां देखेंगे।
वो मेरी सब मजबूरियां देखेंगे।

जलाकर सबके दिल ओ जिस्म,
वो कई रोशनियां देखेंगे।

रहकर जश्न ए महफ़िल में,
वो मेरी तन्हाइयां देखेंगे।

होकर आबाद इस जहां में,
वो मेरी बरबादियां देखेंगे।

तुम निकले सैलाब लेकर जो " ख़ामोश",
वो राह में तबाहियां देखेंगे।
..................................................................................
                   अमित कुमार ख़ामोश

तुम ही से तो मेरा........

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तुम ही से तो मेरा वजूद है।
धड़कना दिल इसका सबूत है।


ढूँढते तुमको फ़िरते सब इबादत खाने में,
खुद को ढूँढते हम बस इतना जरूर है।



लगया न गले हमने किसी को मुहब्बत से,
बनाकर आदमी मुझको तुमने की करतूत है।



बसा लेंगें तुमको अपने मकान ए इश्क में,
माना जिस्म कमजोर मगर दिल मजबूत है।



रूठ गए तुम  तो "ख़ामोश" किधर जाएंगे,
कैसे उतरेगा चढ़ा मुझपे तुम्हरा जो सरूर है।
...................................................................................
                  अमित कुमार ख़ामोश


कोई चला गया कहीं मेरा .........

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कोई चला गया कहीं मेरा दिल तोड़ कर।
फरार हो गया परिंदा आशियाना छोड़ कर।


जो करते बयाँ लफ्ज ए मुहब्बत जुबाँ से,
कैसे चले जाते हैं वो ऐसे मुँह मोड़ कर।


घूमता हूँ बंजारा बनकर न मिलेगा पता मेरा,
बना लेते हैं ठिकाना सबसे दिल जोड़ कर।


खता मेरी कि मैं सिर्फ उनको देखता हूँ,
गुजर जाते हैं मुझसे वो चेहरा फेर कर।


उम्र भर भागते रहते "ख़ामोश" उनके पीछे,
इक बार लग जाते मेरे गले वो दौड़ कर।
....................................................................................                          अमित कुमार ख़ामोश




सोमवार, 3 सितंबर 2018

मेरे मिट जाएं गम कुछ ............

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मेरे मिट जाएं गम तुम ऐसा कर दो।
कुछ न सही तो अपने  जैसा कर दो।


तुम्हारे पहलू में सम्हल जाए मेरा दिल,
इतना सा फायदा तुम मेरा कर दो।


देकर पनाह सबको अपनी महफ़िल में,
जो बेघर हैं उन्हें तुम सहारा कर दो।


छिपाते फ़िरते हैं वो जमाने से इश्क तो,
बयाँ न लफ्जों में तो आंख से इशारा कर दो।


क्या है "ख़ामोश" जो तुम न कर सको,
नजरों से तुम दुश्मन को भी अपना कर दो।
................................................................................
                  अमित कुमार ख़ामोश




शनिवार, 1 सितंबर 2018

लौट आना मेरे पास जब शाम हो..........

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लौट आना मेरे पास जब शाम हो जाये।
अधूरा जो रह गया वो मेरा काम हो जाये।

हर कोई चाहता है तुमसे दिल्लगी करना,
करेंगे हम ऐसी दोस्ती कि नाम हो जाये।

सब आते हैं पूछने मेरे दर्द ए दिल की वजह,
डरता हूँ बताने से कहीं वो न बदनाम हो जाये।

तुम्हारे साथ रहकर हमें होता था जो नशा,
मिलता नहीं कोई अब जिसके साथ इक जाम हो जाये।

ढूंढ़ते फिरते हैं "ख़ामोश" मेरे जैसा कोई आशिक,
देखें कहीं कोई आज फिर सरेआम हो जाये।
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           अमित कुमार ख़ामोश




होती नहीं मुलाकात उनसे...........

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होती नहीं मुलाकात उनसे अकेले में।
तन्हा मेरी ज़िंदगी  होकर भी मेले में।

लगी है जो मेरे दिल जिगर में,
वो आग हो नहीं सकती शोले में।

आये मेरे पास बहाना आँसुओ का लेकर,
कम हो जाए मेरा गम शायद रोने में।

गुजर गयी मेरी सांसे वफ़ा करते करते,
लम्हा नहीं लगा उन्हें वेवफाई करने में।

लिये चलते हैं "ख़ामोश" दर्द ए दिल की दवा,
कहाँ देर लगती है किसी को जख्म देने में।
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                       अमित कुमार ख़ामोश

तेरी नजरों का तीर............

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तेरी नजरों का तीर जो मेरी ओर चला था।
मैं लेने मरहम ए जख्म तेरी ओर चला था।

मैंने खाई चोट खुद ही दीवार बनकर,
जिस कदर होकर मैं नशे में चूर चला था।

कर ली दुनिया हासिल जिसने अपने दम पर,
हकीकत में वो जमीं से बहुत दूर चला था।

उतारी जब तुमने अपनी कश्ती दरिया में तो,
किनारा तब समुन्दर का मैं छोड़ चला था।

कमजोर मकां में रहने वाले मजबूत दिल होते थे,
इस जहाँ में भी "ख़ामोश" ऐसा दौर चला था।
....................................................................................
                 अमित कुमार ख़ामोश

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

छोड़ गई साथ मेरा परछाई........

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छोड़ गई है मेरा साथ परछाई भी।
शायद नराज है मुझसे खुदाई भी।

चले जाते तुम कहीं भी मुझसे वादा करके,
सह लेते हम वो तुम्हारी जुदाई भी।

देते रहे तुम मुझे तमाम उम्र जख्म,
और कर दी मेरे नाम बेवफ़ाई भी।

ऐसे बर्बाद हुए तुम्हारी आशिकी में कि,
करेगी न आबाद किसी की रहनुमाई भी।

जब तक न आओगे "खामोश" तबियत देखने,
करेगी न असर मुझको कोई दवाई भी।
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                             अमित कुमार ख़ामोश

चलो साथ में मयकदा चलते.........

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चलो हम साथ में मयकदा चलते हैं।
जहाँ होंठों से नहीं जाम दिल से मिलते हैं।

हम बार बार झाँकते उनकी गली की तरफ,
कहते हैं वो की हम आवारगी करते हैं।


मैं जिंदा हुआ हूँ उनपे मर मिटने के बाद,
अफसोस कि वो किसी और पे मरते हैं।


किसी को मिलती नहीं खुशी किसी को खुश देखकर,
चिरागों की जगह तो वहां जिस्म जलते हैं।


मुमकिन नहीं जो राह ए मुहब्बत में "ख़ामोश",
ऐसी बात वो हमसे  ही कहते हैं।
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          अमित कुमार ख़ामोश


ग़ज़ल/नज्म.........मिल गया सकूँ हमें जब शराब......

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मिल गया सकूँ हमें जब शराब मिल गई।
अधूरी जो रह गई थी वो किताब मिल गई।

तुमको मान लिया था मैंने सब कुछ अपना,
बदकिस्मती से हमें ज़िन्दगी ख़राब मिल गई।

गुमान करती हो अपनी सूरत देखकर जिसमें,
उस बेवफा आईने में हमें दरार मिल गई।

न जाने कब से मेरा उजड़ा हुआ चमन था ,
तुम आये तो फूल खिलने को बहार मिल गई।

मुझे रात में मिलता गया अँधेरा ही "ख़ामोश",
तुम निकले तो तुम्हे चांदनी जवान मिल गई।
.............................................................................
                अमित कुमार "ख़ामोश"

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गज़ल/नज्म..............लगता है डर इजहार ए मुहब्बत......

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 लगता है डर इजहार ए मुहब्बत करने में।
 होती हैं कोशिशें जैसे जमानत करने में।

 दुनिया की भीड़ में मिला गम ही मुझको,
 मिलती खुशी मुझे तुमसे शरारत करने में।

 तुम मेरे हो जाओ अगर खुदा की कसम,
 हो जाऊं फ़ना मैं तुम्हारी हिफ़ाजत करने में।

 कर रहे हो गीली अपने आँसुओ से मेरी कब्र,
 तुमने देर कर दी मुझ पर इनायत करने में।

"ख़ामोश" खोलकर लहरा दो इक बार जुल्फों को,
 दे दो साथ अँधेरे का तुम क़यामत  करने में।
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                      अमित कुमार खामोश

गज़ल/नज्म।.......सोचता हूँ मशहूर.......

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सोचता कि मशहूर तुम्हारा नाम कर दूं।
अधूरी कहानी का खत्म अंजाम कर दूं।

आ न पाए सुबह तक कोई होश में,
इस कदर महफ़िल ए जाम कर दूं।

हौसला न तुम में दो कदम साथ चलने का,
अकेले मैं मुहब्बत के सारे काम कर दूं।

इजहार कर दो तुम जो सामने आकर के,
ऐसे इश्क में खुद को मैं बदनाम कर दूं।

चली गयी आदत "खामोश" वार करने की,
जिद पे आऊं तो कत्लेआम कर दूं।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

शेर..... न मैं बदला....

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न मैं बदला न मेरी फ़ितरत "ख़ामोश"
हाँ थोड़ा सा बदल गया है वक्त मेरा।

ग़ज़ल/नज्म................नहीं जाती खाली दुआ.........

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नहीं जाती दुआ खाली किसी गरीब की।
बदल जाती है जिंदगी बिगड़े नसीब की।

आंको न चेहरे को सबके दिल में रब है,
हो जायेगी बदनामी इंसा शरीफ की।

सब खफ़ा तुम्हारे अंदाज ए दिल्लगी से,
जरूरत तुम्हे तो दवा ए तहजीब की।

बीमार कर गये तुम यूँ सामने आकर,
छूकर न देखी तबियत भी तुमने मरीज की।

बहुत मिलता है "ख़ामोश" इश्क बांटने वालों को,
सिर्फ बददुआ न लेना कभी किसी फ़क़ीर की।
..............................................................................
                  अमित कुमार "ख़ामोश"

बुधवार, 29 अगस्त 2018

नज्म/ग़ज़ल..........लगी है भूख

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लगी है भूख आदमी को दौलत की।
बुझती नहीं प्यास कभी शोहरत की।

तुम जो कर दो अपने इश्क में फ़ना मुझको,
पूरी हो जायेगी मेरी ख्वाहिश जन्नत की।

कर न पाये हक़ीम दवा मरीज ए इश्क की,
जरूरत है तुम्हे अब ख़ुदा ए रहमत की।

पाने तुम्हारी चाहत निकल आएंगे कब्र से,
इंतजार है तो सिर्फ तुम्हारी इजाजत की।

हम जा रहे हमें मुस्कुरा के विदा करो "खामोश"
ठहर गये आँसू जो तुमने ऐसी अदावत की।
............................................................................
                         अमित कुमार ख़ामोश

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ग़ज़ल/ नज्म.........चाँद को पाने से क्या........

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चाँद को पाने से रोकेगा क्या ज़माना मुझको।
तुम खुद ही बनाओगी अपना दीवाना मुझको।

बयाँ लफ़्ज़-ए-मुहब्बत हम कर जायँगे कुछ तो,
कहेगी इक दिन सारी दुनिया शायराना मुझको।

आता और जाता रहता है ये वक्त यूँ ही साहिब,
रहें बांकी निशा ऐसा बनाना है फसाना मुझको।

तुम उजाड़ोगे मेरा घर जब अपने वजूद के लिए,
दे दिया होगा किसी ने  दिल मे ठिकाना मुझको।

रूह तक निकलती नहीं "ख़ामोश" जिस्म से जो,
पास रहकर सिखा दिया तुमने तड़पाना मुझको।
.............................................................................
                         अमित कुमार ख़ामोश

ग़ज़ल/नज्म

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कुछ तो है उनके दिल में जो वो मुझसे बात करते हैं।
हाल इधर भी वही है जो हम भी उनसे बात करते हैं।


अगर इश्क है तो बयाँ कर दो तुम मुझसे,
चिराग अकेले तो नहीं आग करते हैं।

घुमा फिरा के पूछना मेरे हाल ए दिल का राज,
वो तो बस हमें यूँ ही बेताब करते हैं।

बहकने लगीं कश्तियां लहरों पे चलते चलते,
हमारी तरफ वो और उनकी तरफ हम हाथ करते हैं।

चले आओ मेरे पास तुम "ख़ामोश" तड़पकर,
तुम्हारे कदम अब मेरे दिल में आवाज करते हैं।
...............................................................................
                 अमित कुमार ख़ामोश

ग़ज़ल/नज्म

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क़सूर शराब का हर बार नहीं होता।
नहीं होता नशा जब तक दीदार नहीं होता।

समझते हैं खुद को ख़ुदा आशिकी का,
मशहूर हैं जब तक निगाहों से वार नहीं होता।

निकला है बेपनाह हुस्न कयामत लाने कहीं,
हम पे गिरी बिजली ये हमें ऐतबार नहीं होता।

देखकर जिस्म कर दिया बदनाम मुहब्बत को,
ये इश्क-ए-ख़ुदा है कई बार नहीं होता।

जैसे हो तुम "ख़ामोश" वैसे ही नजर आओगे,
दूसरा कोई चेहरा आईने के पार नहीं होता।
...............................................................................
              अमित कुमार ख़ामोश


सोमवार, 27 अगस्त 2018

कुछ बीमार.......

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कुछ बीमार से लगते हो।
जब सामने मेरे आते हो।

मुरझाये फूल से तुम हो,
जब पलकें झपकते हो।

नशे में हो तुम शायद ,
जो कदम डगमगाते हो।

कर ली है दोस्ती आग से,
तुम सबके दिल जलाते हो।

गुजरते हो "ख़ामोश" तुम चमन से,
तब फूल तुम खिलाते हो।
..............................................................
               अमित कुमार ख़ामोश

हर किसी को तुम .........

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हर किसी को तुम बीमार करती हो।
अपनी निगाहों से तुम शिकार करती हो।

करती हैं इशारा तुम्हारी आंखे बांहों में लेने को,
फिर भी तुम जुबां से इंकार करती हो।

हम क्या नाम दें तुम्हारी इस अदा का सनम,
तुम हर किसी से इश्क का इजहार करती हो।

इक बूंद न मिली मुझे तुम्हारी मुहब्बत की,
आकर सामने मुझे और बे करार करती हो।

मांगती इजाजत तुमसे "ख़ामोश" काली घटा,
अपने चेहरे पे जब जुल्फों की दीवार करती हो।
.................................................................................
                 अमित कुमार "ख़ामोश"

कोई बात बेवजह.......

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कोई बात बे वजह नहीं होती।
रात न हो तो सुबह नहीं होती।

बात अगर मैदान-ए-जंग की हो तो,
बिन हार के फतह नहीं होती।

लिख दें बहुत लफ़्ज़-ए-मुहब्ब्त मगर,
ज़िक्र न हो तेरा वो ग़ज़ल नहीं होती।

बच जाते हैं लोग खंजर के वार से भी,
तेरी कातिल नजर सी कोई नजर नहीं होती।

लौट आये मौत से मिलकर "ख़ामोश" क्योंकि,
ख़ुदा की इनायत हर जगह नहीं होती।
.........................................................................
            अमित कुमार "ख़ामोश"

रविवार, 26 अगस्त 2018

शायरी

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भीड़ बहुत है मेले में,
तन्हा सही हम अकेले में।
बनाते हैं कारवाँ खुद से "खामोश",
नहीं आदत चलना काफिले में।
...…...............................................
        अमित कुमार ख़ामोश

आ गया है जीना अब तो ........

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आ गया है जीना अब तो तुमसे से मिलके।
भूल गया हूँ मैं खुद को यूं तुम से मिलके।

हंसता है जमाना मुझ पर मेरी ये हालत देखकर,
हो  गया हूँ पागल जब लौटा तुमसे मिलके।

छोड़ दिया है सताना अब तो अंधेरो ने भी,
जब से सीखा जीना तुमसे मिल के।

उम्र भर न सताएंगी तेरी यादें मुझको,
हो गया हूँ बदनाम तेरे नाम से तुमसे मिलके।

भूल गए मुस्कुराना "खामोश" तेरी मुस्कान देखकर,
बिना साहिल भटक रहा समुन्दर में तुमसे मिलके।
....................................................................................
                      अमित कुमार खामोश

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

फायदा है....


फायदा है तिजारत-ए-मुहब्बतें,
बेवफा लूट लेते हैं सिद्दतें।

कर दिया तबाह इक पल में मकां,
बनाने में जिसको लगी थीं मुद्दतें।

छुपता निकलता है जैसे रोज चाँद,
हो गयी हैं ऐसी आदमी की फ़ितरतें।

झुकता ही नही दिल कभी सजदे में,
सिर्फ सर से हो रही हैं ईबादतें।

भरोसा रब की रहमतों पर है "खामोश",
यहां खुद के फ़ैसले हैं और खुद की अदालतें।
............................................................................
                  अमित कुमार "खामोश"

बुधवार, 22 अगस्त 2018

कुछ न खबर .....


  कुछ न खबर है मेरे यार की।
  लगी तलब उनके दीदार की।

   छिपा जो चाँद बादलों के पीछे,
   हुयी साज़िश उनके फरार की।

   भटकते फिरते शहर की गलियां,
   कुछ न खबर मेरे दिलदार की।

   टकरा गए नशे में चूर होकर के,
   न कोई इसमे खता दीवार की।

   हुयी "खामोश" मुहब्ब्त दोनों को,
   ये आँखे बनी वजह इजहार की।
....................................................................................
                  अमित कुमार " खामोश"
 

 


खुश थे बहुत हम.......

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खुश थे बहुत हम बीच यारों के।
फूल थे हम सब जैसे बहारों के।

कैसे थे मेरे यार न पूछो हमसे ये,
सुन लो किस्से बस सितारों के।

सजाते महफ़िल रोज बातों की,
होती सैर समुन्दर किनारों के।

होती थी शरारत समझदारी में,
उठाते फ़ायदा ईंट के दरारों के।

होता बक्त जब इम्तिहान का तो,
घूम आते मेले ख़ूब बाजारों के।

मार मार समझाना अदीब का वो,
एक बना देना हो बीच हज़ारों के।

निकालते आंसू चुपचाप अकेले में,
समझे हालात-ए-इंशा बिन सहारे के।

न गम न कोई शिकवा गिला था,
बनाते महल रेत पर लकीरों के।

बदला वक्त या बदल गया "खामोश",
खुशी नही मिलती पास जो फकीरों के।
.....................................................................
             अमित कुमार "खामोश"





कुछ न है खबर .....

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कुछ न है खबर मेरे यार की।
लगी तलब उनके दीदार की।

छिपा जो चाँद बादलों के पीछे,
साजिश उनके होने फरार की।

ढूंढ़ते रहे शहर की गलियों में,
कुछ खबर न मेरे दिलदार की।

टकरा गए नशे में चूर होकर,
इसमें न कोई खता दीवार की।

हुई "खामोश"मुहब्बत एक दूजे से,
ये आँखे बनी वजह इजहार की।
.................................................................................
                        अमित कुमार " खामोश"



मंगलवार, 21 अगस्त 2018

वो गम ही क्या.....

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वो गम क्या जो किसी को ग़मज़दा न कर दे।
प्यास हो तो ऐसी की बंद मयकदा न कर दे।

क्या है फायदा उस दीदार-ए-हुस्न के शाकी,
जब तक मदहोश उनकी हर अदा न कर दे।

बदनाम इश्क की आवारगी ने कर दिया हमें,
चाहेंगे तब तक दिल तुम्हरा सजदा न कर दे।

कर तो दें इलाज तेरे हर दर्द-ए-दिल का हम,
मैं आवारा तू कहीं मुझसे कोई वफ़ा न कर दे।

तोड़के पाबंदियां "खामोश" तेरा दीदार कर लें,
अदालत-ए-ख़ुदा मुझे मौत की सजा न कर दे।
.................................................................................
                अमित कुमार " खामोश"

हमें आ गया मजा तुम्हारे.......

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हमें आ गया  मजा तुम्हारे  साथ बहकने  में।
शोलों की आग क्या जो मजा दिल दहकने में।

संवरने दो उनको जी भर के आईने के सामने,
अभी लग जायेगी थोड़ी देर चाँद निकलने में,

लिपटी जो है खुश्बू तुम्हारे गुलबदन हुस्न में,
कर दो जरा सी शरारत फूलों के महकने में।

शिकार हमने भी किये थे मगर हुआ न कोई,
कई कर डाले तुमने कत्ल पलक झपकने में।

आरजू-ए-मुहब्बत तुम लग जाते मेरे सीने से,
"खामोश" सांसे जो नाम न हो तेरा धड़कन में।
....................................................................................
            अमित कुमार "खामोश"




हर राह में मिल के.......

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हर राह में मिल कर गुजर गयी तुम।
सीखे जीना मिलके काँटों से ही हम।

बिक गए ख्वाहिशों को खरीदकर के,
फिर भी कीमत जिंदगी नही हुयी कम।

सकूँ मिलता है जब आती है तेरी याद,
जवां तो है कहानी जिस्म में नही दम।

तेरा न था जरा सा भी वास्ता मुझसे,
तो देखके जनाजा आंख क्यों हुई नम।

खो गए भीड़ में खुद को ढूंढते "खामोश",
तुम्हे सम्हाल सकूँ इसलिए हमने पी कम।
.................................................................
               अमित कुमार "खामोश"

लेकर बाहों में .........

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लेकर बाहों में मैंने होंठो से की शुरुआत।
धड़क रहे थे दिल कुछ हो न रही  बात।

जल रहे थे यूँ बदन दोनो के इस कदर से,
बाद जमाने के शोलों से हो रही  बरसात।

कभी हम कुछ चाहते कभी वो कुछ चाहते,
मेरे चेहरे पे उन्होंने कर दी ज़ुल्फों की रात।

कह गए बंद आंखों से लिपटके मुझसे ऐसा,
अब दे दो हमें बे इंतिहा इश्क की  शौगात।

लगी थी उनको भी भूँख मेरी ही जितनी,
दिखने लगीं मंजिले उन्होंने की  शुरआत।

बह गईं थीं कश्तियां आया जो तूफ़ान था,
दूर थे जिस्म मगर दिल की हुई मुलाकात।

सोचके हर वो लम्हा "खामोश" लिखी शायरी,
मैंने बांटी मुहब्ब्त जब दुनिया ने की खुराफ़ात।
..............................................................................
                  अमित कुमार "खामोश"

सोमवार, 20 अगस्त 2018

न जाने किस बात पे.......

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न जाने किस बात पर  वो  जफ़ा करते हैं।
जितना होते दूर हम उतनी वफ़ा करते हैं।

आजमाने को मेरी मुहब्ब्त तरीका ढूंढ़ते हैं,
होकर नादान कोई न कोई खता करते हैं।

समेटके नफ़रत समझते हैं खुद को अर्जमंद,
बिखेरके मुहब्ब्त हम अपना नफा करते हैं।

चुका न  पाए एहसान तुम्हारी रहमतों का,
उतार दूँ एक तो दो और बोझ लदा करते हैं।

घूमते फिरते "खामोश" राह बनी ठिकाना,
यहाँ मंदिर है इश्क का सबाब बटा करते हैं।
..................................................................................
*अर्जमन्द- महान
                       अमित कुमार "खामोश"

करके हासिल मंजिल............

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करके हासिल  मंजिल दुनिया को दिखाना  है।
कहे जब जमाना ये तो बड़ा अजीब दीवाना है।

डूब  जाते हैं कुछ  लोग समुन्दर की लहरों से,
निकालना कश्ती तूफ़ान से सबको सिखाना है।

गुजार देते हैं ताउम्र एक ख्वाहिश पूरी करने में,
तुमको तो हजारों कामयाबियों से मिलाना है।

जो बात है तुम में वो किसी में हो नही सकती,
फिर तुम्हेअपनी शोहरत को याद दिलाना है।

ग़मज़दा हो भी गए तो परवाह न की "खामोश",
हरा के खुद को किसी चेहरे को जिताना है।
..........................................................................
          अमित कुमार " खामोश"

देखने नज़ारा जी उठे .......

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देखने नज़ारा जी  उठे हम  कफ़न से।
सरकी जब बूंद पानी उनके दामन से।

देख लपटें उनके अंग अंग से तो सोचा,
बुझा दूँ आग लिपट के उनके बदन से।

हुआ सामना जब वो निकले पानी से,
जैसे मिल गया हो फूल कोई चमन से।

सुखा दूँ जुल्फें अपनी गरम सांसो से,
कुछ  ऐसा ख्याल आया मेरे जहन से।

काश ये ख्वाब सच हो जाये "खामोश",
रह कर जिंदा हम हों जाएँ दफन से।
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         अमित कुमार  "खामोश"

बेमुहब्बत जिंदगी के मायने क्या.......

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बेमुहब्बत जिंदगी के मायने क्या।
होआवारगी तो फिर कायदे क्या।

तलब है कुछ नशा हो जाए मुझे,
सामने तुम तो जाना मैकदे क्या।

लेकर मेरा दिल तुम खुश नही तो,
सच बता तो की तुम चाहते क्या।

झुक गए सर इबादत के लिए सब,
निकले न दुआ ऐसे सजदे  क्या।

सुबह होश में आ जाएं "खामोश",
ऐसी शराब पीने से फायदे क्या।
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               अमित कुमार "खामोश"

रविवार, 19 अगस्त 2018

आरजू है तुझे...

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मेरी अतीत है तू...

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कुछ अलग......

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कुछ अलग कर जाने की जिद है हमारी।
कारवाँ में चलने की आदत नहीं है हमारी।
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                     अमित कुमार" खामोश"

छुप छुप देखते थे........

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छुपकर देखते थे सरे आम हुऐ।
गली से गुजरे तो बद नाम हुए।

मिला दर्द जब गम से रूबरू हुए,
खुशी के लिए जाम पे जाम हुए।

हर अंग कयामत है ये सुना है,
निग़ाहों से सब कत्ले आम हुए।

अलग अंदाज चाहे आजमा लेना,
जो तुम्हे चाहने वाले तमाम हुए।

बहाना ढूढ़ते तेेरे दीदार के लिए,
तेरे घर के सामने मेरे काम हुए।

"खामोश' मुहब्ब्त सही इजहार से,
हम आबाद और कुछ गुम नाम हुए।
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                         अमित कुमार "खामोश"

जिनकी बदल नहीं...........

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जब बदल नहीं सकती  फ़ितरत।
उनसे हो ही नहीं सकती इबादत।

अमल न बातों का जिंदगी में किया,
कभी कबूल हो नहीं सकती जियारत।

इश्क है सच्चा जिनको ख़ुदा से ही,
उनसे हो ही नहीं सकती हिमाकत।

दिल में कुछ और होंठों पे कुछ और,
वो दुआ कर नहीं सकती हिफ़ाजत।

लेकर वफ़ा "खामोश" देते हैं बेवफ़ाई,
मुहब्बत ए खुदा कर नहीं सकती तिजारत।
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*फ़ितरत- चालबाजी
*जियारत- तीर्थयात्रा
*हिमाकत- मूर्खता
*तिजारत-वयापार।                 अमित कुमार " खामोश"


चलते चलते दिन में.........

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चलते चलते दिन में रात नजर  आने लगी।
जो थी पास मंजिल वो दूर नजर आने लगी।

गम के पत्थरों ने रोक लिया था रास्ता मेरा,
खुली जगह में इक दीवार नजर आने लगी।

निकल आये कदम बहुत दूर वापस जाएँ कैसे,
समुन्दर की कश्ती तो आब नजर आने लगी।

मिल न सका जिसका देखा था ख्वाब पाने को,
देखा आसमां तो वँहा जमीन नजर आने लगी।

छोड़ जाएंगे साथ "खामोश" ऐसे तो न चाहा था,
पी  कभी आंखों से वो शराब नजर आने लगी।
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  *आब- पानी
                                         अमित कुमार "खामोश"

खूबसूरत हैं ये बात...........

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खूबसूरत हैं ये बात उन्हें आईने से पता चली।
बुझाने किसी की प्यास बादलों की घटा चली।

गिर गईं बिजलियां जो गुजरे उनके सामने से,
कसूरवार वो  थे ये मालूम उनकी जफ़ा चली।

कुछ न कह पाये होंठो से सामने जब मेरे आये,
कुछ इशारे थे हमें ये उनकी आंख बता चली।

लिपटे रहे हम दोनों एक दूसरे के आगोश में,
छोड़कर खुसबू बदन की वो हर सबूत मिटा चली।

होगा एक ही चाँद आसमां या जमीं पर "खामोश",
ये बात यहाँ अदालत-ए-आशिक कई दफा चली।
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                               अमित कुमार"खामोश"

शनिवार, 18 अगस्त 2018

सामने मुहब्बत पीछे रंजिशें.........

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सामने मुहब्ब्त पीछे तो रंजिशें हैं।
महफ़िल-ए-वफ़ा- तो  साजिशें हैं।

रो कर रात भर दिन में हंसते हैं,
मरके जिंदा रहने की कोशिशें हैं।

जला दिए चिराग अंधेरी राहों में,
बढ़े कदम तो चलने की बंदिशें हैं।

आग दिल मे और धुंआ शहर है,
सबकी ज़िन्दगी में कुछ गर्दिशें हैं।

चीखते "खामोश" घर की लपटें देख,
आये सब लिए हाँथ में माचिशें हैं।
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                            अमित कुमार "खामोश"

था इंतजार सदियों से.......

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था इंतजार सदियों से तब दीदार हुए।
था सामने हकीम और हम बीमार हुए।

दिया दर्द काँटो से ज्यादा बातों ने मुझको,
जाल मेरा था फिर भी उनके शिकार हुए।

खाई थी कसमें हसीन मंजिल पाने को साथ,
वो मलिका-ए-हुस्न हुई और हम बेकार हुए।

लाश बन गया जिस्म जुदा रूह से होकर,
हम जमीन हवाले वो औरों पे निसार हुए।

सच थी "खामोश"आशिकी हाल लेने जो आये,
खोदने को कब्र मेरी उनके हाथ औजार हुए।
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                    अमित कुमार "खामोश"




गुजर जाएंगे गम के बादल ऐसा  वक्त तो आएगा।
सुधर जाएंगे बहकने से दिल ऐसा सख्त हो जाएगा।

चल रहा कारवाँ मुफ़लिसों का आगे आगे हम हैं, 
नफ़रत-ए-कत्ल से हासिल मुहब्बत का तख्त हो जाएगा।

बिछा दो राहों में जज्बातों को  मेरा महबूब आएगा,
गुजर गए सिर्फ  वो गली से तो मेरा बख्त हो जाएगा।

खुद बिखर गए "खामोश" इस ज़माने को संभालकर,
मिट गया ज़िस्म क्या हुआ नाम तो जब्त हो जाएगा।
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* बख्त- सौभाग्य
* तख्त-सिंहासन
                                   अमित कुमार "खामोश"

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

जो मिली न किसी को.........

जो मिली न थी किसी को , वो खुशी मिल गयी।
निकला जो बांटने दर्द , दुनिया दुखी मिल गयी।

तराशते रहे जिस घर को ताउम्र मेहनत से हम,
कोई जबर कहता , कहीं दीवार झुकी मिल गयी।

बेसब्र इंतजार सबको मेरा रौनक-ए-दरबार मे,
वो आये पहले और मुझे महफ़िल लुटी मिल गयी।

मुहब्बत शिद्दत से थी फिर भी कुछ डर था मुझे,
हो मुलाकात तो चांदनी चाँद की छुपी मिल गयी।

सब  परेशान "खामोश" किसी न किसी गम से,
कहीं जल रहे दिये कहीं शमा बुझी मिल गयी।
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* जबर- उत्तम
                       अमित कुमार" खामोश"

न कुछ कर सके तो..........

  न कुछ कर सके तो हम दुआ दे जाएंगे।
  सीखा दूंगा जीना जो मेरी कब्र पे आएंगे।।

  मिलता है सकूँ अब पत्थर पर सो कर,
  बदले में अपनी मौत के जिंदगी दे जाएंगे।

  कुछ ख्वाहिशें जो थीं वो अधूरी सी थीं,
  सबने कहा कुछ न ज़माने से हम ले पाएंगे।

  सब करते हैं गुस्ताखियां वो हमने भी कीं,
  जो खुद ही थे गलत वो अब सजा दे जाएंगे।

  अकेले ही सही "खामोश" झूठी मुहब्बत से,
  दवा न दे पाए सही पर हम दर्द कम दे जाएंगे।
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                             अमित कुमार" खामोश"
 
 

समझ न पाया ज़िन्दगी को.........

  समझ न पाए हम जिंदगी को करीब से।
  करता रहा कोशिशें पर हासिल नसीब से।

  कर दी दफन ख्वाहिशें जिंदा रहते ही,
  आकर मिली मौत मुझसे बड़े तहजीब से।

  न थी पास दौलत तो मुहब्बत बांटता गया,
   इस कदर जीत गया यूँ पागल अदीब से।

   दिल में तस्वीर बसी थी जिनकी ज़माने से,
   सामने वो जब आये तो थे कुछ अजीब से।

   ऐसे न थे "खामोश" की बेवफा हो जाएंगे,
   रोये चुपचाप जब देखा मिलते उनको रकीब से।
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                                         अमित कुमार "खामोश"
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   * अदीब- विद्धवान
    * रकीब- दूसरा प्रेमी

आ गए पास मौत..........

   ठहर गए हम मौत के पास तुमसे दूर रह कर।
   गम देते आगे कहानी में तुम इन्तजार कह कर।

   मिल के बिछड़ना, बिछड़ के मिलना कब तक,
   कर दो खत्म दर्द-ए-दिल तुम मेरे पास आ कर।

   बन न जाये ये शहर की दूरी कहीं दिल की दूरी,
   पा लूंगा तुम्हे अगली बार इस ज़िन्दगी में मर कर।

   बंदिशें कर रहीं कैद हम दोनों को धीरे धीरे से,
   इन्तजार जब तक जिस्म हो न जाये खाक जल कर।

   सुनाते रहेंगे "खामोश" मजबूरी अपने हालात की,
   बिखर जाएगा जो देखा था ख्वाब तुमसे जुदा हो कर।
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                           अमित कुमार " ख़ामोश"

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

कर गई तबाह.........

   कर गई तबाह तेरी मुहब्बत  मुझको।
   दिखी थी तुम में कभी ज़न्नत मुझको।

   कहाँ जाए टूटे दिल,पस्त हौसलों को लेकर,
    सम्हल जाते थे कभी हम देखकर तुमको।

    रह न पाओगे एक पल मेरे बिना तुम अकेले,
    हो न हिफाजत तो सौंप देना मेरा दिल मुझको।

    पाल रखे हैं बड़े बड़े शौक अजीब से तुमने,
    समझदारी नादानी में भी हो मुबारक तुमको।

    कर दिया मशहूर बेवफाई को वफ़ा के नाम पर,
    किया था इश्क दोनो ने बदनाम कर दिया मुझको।
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                               अमित कुमार "खामोश"

होश खो बैठे..............

   होश खो बैठे तुम्हे देखने वाले।
   मशहूर हो गए तुम्हे चाहने वाले।

   न बच सके तुम्हारी तिरछी नज़रों से,
   जो बदनाम थे कभी कत्ल करने वाले।

   पीते गए हम जाम पे जाम नशा न हुआ,
   हुए मदहोश तुम्हारे पास से गुजरने वाले।

   सबकी ख्वाहिश-ए-हासिल तुम क्यों न हो,
   मांगते सांसे तेरे दीदार को कब्र में रहने वाले।

   खता हो गई "खामोश" चिराग़ों से दोस्ती करके,
   मिल गई रोशनी सबको तुम्हारे साथ चलने वाले।
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                                अमित कुमार"खामोश"

हम थोड़े से हैं...........

www.nilkhamos.blogspot.com हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल। वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल। हम ...