सोमवार, 20 अगस्त 2018

देखने नज़ारा जी उठे .......

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देखने नज़ारा जी  उठे हम  कफ़न से।
सरकी जब बूंद पानी उनके दामन से।

देख लपटें उनके अंग अंग से तो सोचा,
बुझा दूँ आग लिपट के उनके बदन से।

हुआ सामना जब वो निकले पानी से,
जैसे मिल गया हो फूल कोई चमन से।

सुखा दूँ जुल्फें अपनी गरम सांसो से,
कुछ  ऐसा ख्याल आया मेरे जहन से।

काश ये ख्वाब सच हो जाये "खामोश",
रह कर जिंदा हम हों जाएँ दफन से।
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         अमित कुमार  "खामोश"

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