शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

जो मिली न किसी को.........

जो मिली न थी किसी को , वो खुशी मिल गयी।
निकला जो बांटने दर्द , दुनिया दुखी मिल गयी।

तराशते रहे जिस घर को ताउम्र मेहनत से हम,
कोई जबर कहता , कहीं दीवार झुकी मिल गयी।

बेसब्र इंतजार सबको मेरा रौनक-ए-दरबार मे,
वो आये पहले और मुझे महफ़िल लुटी मिल गयी।

मुहब्बत शिद्दत से थी फिर भी कुछ डर था मुझे,
हो मुलाकात तो चांदनी चाँद की छुपी मिल गयी।

सब  परेशान "खामोश" किसी न किसी गम से,
कहीं जल रहे दिये कहीं शमा बुझी मिल गयी।
....................................................................
* जबर- उत्तम
                       अमित कुमार" खामोश"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

http://www.nilkhamos.blogspot.com

हम थोड़े से हैं...........

www.nilkhamos.blogspot.com हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल। वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल। हम ...