गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गज़ल/नज्म..............लगता है डर इजहार ए मुहब्बत......

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 लगता है डर इजहार ए मुहब्बत करने में।
 होती हैं कोशिशें जैसे जमानत करने में।

 दुनिया की भीड़ में मिला गम ही मुझको,
 मिलती खुशी मुझे तुमसे शरारत करने में।

 तुम मेरे हो जाओ अगर खुदा की कसम,
 हो जाऊं फ़ना मैं तुम्हारी हिफ़ाजत करने में।

 कर रहे हो गीली अपने आँसुओ से मेरी कब्र,
 तुमने देर कर दी मुझ पर इनायत करने में।

"ख़ामोश" खोलकर लहरा दो इक बार जुल्फों को,
 दे दो साथ अँधेरे का तुम क़यामत  करने में।
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                      अमित कुमार खामोश

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