मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ग़ज़ल/ नज्म.........चाँद को पाने से क्या........

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चाँद को पाने से रोकेगा क्या ज़माना मुझको।
तुम खुद ही बनाओगी अपना दीवाना मुझको।

बयाँ लफ़्ज़-ए-मुहब्बत हम कर जायँगे कुछ तो,
कहेगी इक दिन सारी दुनिया शायराना मुझको।

आता और जाता रहता है ये वक्त यूँ ही साहिब,
रहें बांकी निशा ऐसा बनाना है फसाना मुझको।

तुम उजाड़ोगे मेरा घर जब अपने वजूद के लिए,
दे दिया होगा किसी ने  दिल मे ठिकाना मुझको।

रूह तक निकलती नहीं "ख़ामोश" जिस्म से जो,
पास रहकर सिखा दिया तुमने तड़पाना मुझको।
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                         अमित कुमार ख़ामोश

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