मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ग़ज़ल/नज्म

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क़सूर शराब का हर बार नहीं होता।
नहीं होता नशा जब तक दीदार नहीं होता।

समझते हैं खुद को ख़ुदा आशिकी का,
मशहूर हैं जब तक निगाहों से वार नहीं होता।

निकला है बेपनाह हुस्न कयामत लाने कहीं,
हम पे गिरी बिजली ये हमें ऐतबार नहीं होता।

देखकर जिस्म कर दिया बदनाम मुहब्बत को,
ये इश्क-ए-ख़ुदा है कई बार नहीं होता।

जैसे हो तुम "ख़ामोश" वैसे ही नजर आओगे,
दूसरा कोई चेहरा आईने के पार नहीं होता।
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              अमित कुमार ख़ामोश


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