फायदा है तिजारत-ए-मुहब्बतें,
बेवफा लूट लेते हैं सिद्दतें।
कर दिया तबाह इक पल में मकां,
बनाने में जिसको लगी थीं मुद्दतें।
छुपता निकलता है जैसे रोज चाँद,
हो गयी हैं ऐसी आदमी की फ़ितरतें।
झुकता ही नही दिल कभी सजदे में,
सिर्फ सर से हो रही हैं ईबादतें।
भरोसा रब की रहमतों पर है "खामोश",
यहां खुद के फ़ैसले हैं और खुद की अदालतें।
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अमित कुमार "खामोश"
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