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हर किसी को तुम बीमार करती हो।
अपनी निगाहों से तुम शिकार करती हो।
करती हैं इशारा तुम्हारी आंखे बांहों में लेने को,
फिर भी तुम जुबां से इंकार करती हो।
हम क्या नाम दें तुम्हारी इस अदा का सनम,
तुम हर किसी से इश्क का इजहार करती हो।
इक बूंद न मिली मुझे तुम्हारी मुहब्बत की,
आकर सामने मुझे और बे करार करती हो।
मांगती इजाजत तुमसे "ख़ामोश" काली घटा,
अपने चेहरे पे जब जुल्फों की दीवार करती हो।
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अमित कुमार "ख़ामोश"
हर किसी को तुम बीमार करती हो।
अपनी निगाहों से तुम शिकार करती हो।
करती हैं इशारा तुम्हारी आंखे बांहों में लेने को,
फिर भी तुम जुबां से इंकार करती हो।
हम क्या नाम दें तुम्हारी इस अदा का सनम,
तुम हर किसी से इश्क का इजहार करती हो।
इक बूंद न मिली मुझे तुम्हारी मुहब्बत की,
आकर सामने मुझे और बे करार करती हो।
मांगती इजाजत तुमसे "ख़ामोश" काली घटा,
अपने चेहरे पे जब जुल्फों की दीवार करती हो।
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अमित कुमार "ख़ामोश"
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