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चलो हम साथ में मयकदा चलते हैं।
जहाँ होंठों से नहीं जाम दिल से मिलते हैं।
हम बार बार झाँकते उनकी गली की तरफ,
कहते हैं वो की हम आवारगी करते हैं।
मैं जिंदा हुआ हूँ उनपे मर मिटने के बाद,
अफसोस कि वो किसी और पे मरते हैं।
किसी को मिलती नहीं खुशी किसी को खुश देखकर,
चिरागों की जगह तो वहां जिस्म जलते हैं।
मुमकिन नहीं जो राह ए मुहब्बत में "ख़ामोश",
ऐसी बात वो हमसे ही कहते हैं।
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अमित कुमार ख़ामोश
चलो हम साथ में मयकदा चलते हैं।
जहाँ होंठों से नहीं जाम दिल से मिलते हैं।
हम बार बार झाँकते उनकी गली की तरफ,
कहते हैं वो की हम आवारगी करते हैं।
मैं जिंदा हुआ हूँ उनपे मर मिटने के बाद,
अफसोस कि वो किसी और पे मरते हैं।
किसी को मिलती नहीं खुशी किसी को खुश देखकर,
चिरागों की जगह तो वहां जिस्म जलते हैं।
मुमकिन नहीं जो राह ए मुहब्बत में "ख़ामोश",
ऐसी बात वो हमसे ही कहते हैं।
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अमित कुमार ख़ामोश
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