बस गए हो तुम दिल में मेरे धड़कन की जगह।
फैल गए हो तुम फिज़ाओं में खुसबू की तरह।
काली घटा हैं गेसू, गुलबदन है हुस्न, आंखे कयामत,
हुए जो हम फना इश्क में, तुम हो इसकी वजह।
सादगी से तुम्हारा रहना, है जाता कहर बरपा,
लग जाती जो तुम्हे नजर, आईना है इसकी वजह।
करने दीदार जन्नत के, आते बहाने से तुम्हारे पास,
कौन हकदार बाहों का, करती हो तुम सबसे जिरह।
आया न होश में जो रहा "खामोश" तुम्हारे आगोश में,
दे ना पायेगा साथ मयखाना, हम हुए जो तुमसे विरह।
........................................................................
अमित कुमार" खामोश"
विरह---- वियोग
जिरह----पुछताछ
फैल गए हो तुम फिज़ाओं में खुसबू की तरह।
काली घटा हैं गेसू, गुलबदन है हुस्न, आंखे कयामत,
हुए जो हम फना इश्क में, तुम हो इसकी वजह।
सादगी से तुम्हारा रहना, है जाता कहर बरपा,
लग जाती जो तुम्हे नजर, आईना है इसकी वजह।
करने दीदार जन्नत के, आते बहाने से तुम्हारे पास,
कौन हकदार बाहों का, करती हो तुम सबसे जिरह।
आया न होश में जो रहा "खामोश" तुम्हारे आगोश में,
दे ना पायेगा साथ मयखाना, हम हुए जो तुमसे विरह।
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अमित कुमार" खामोश"
विरह---- वियोग
जिरह----पुछताछ
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