शनिवार, 18 अगस्त 2018

गुजर जाएंगे गम के बादल ऐसा  वक्त तो आएगा।
सुधर जाएंगे बहकने से दिल ऐसा सख्त हो जाएगा।

चल रहा कारवाँ मुफ़लिसों का आगे आगे हम हैं, 
नफ़रत-ए-कत्ल से हासिल मुहब्बत का तख्त हो जाएगा।

बिछा दो राहों में जज्बातों को  मेरा महबूब आएगा,
गुजर गए सिर्फ  वो गली से तो मेरा बख्त हो जाएगा।

खुद बिखर गए "खामोश" इस ज़माने को संभालकर,
मिट गया ज़िस्म क्या हुआ नाम तो जब्त हो जाएगा।
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* बख्त- सौभाग्य
* तख्त-सिंहासन
                                   अमित कुमार "खामोश"

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