http://www.nilkhamos.blogspot.com
मिल गया सकूँ हमें जब शराब मिल गई।
अधूरी जो रह गई थी वो किताब मिल गई।
तुमको मान लिया था मैंने सब कुछ अपना,
बदकिस्मती से हमें ज़िन्दगी ख़राब मिल गई।
गुमान करती हो अपनी सूरत देखकर जिसमें,
उस बेवफा आईने में हमें दरार मिल गई।
न जाने कब से मेरा उजड़ा हुआ चमन था ,
तुम आये तो फूल खिलने को बहार मिल गई।
मुझे रात में मिलता गया अँधेरा ही "ख़ामोश",
तुम निकले तो तुम्हे चांदनी जवान मिल गई।
.............................................................................
अमित कुमार "ख़ामोश"
मिल गया सकूँ हमें जब शराब मिल गई।
अधूरी जो रह गई थी वो किताब मिल गई।
तुमको मान लिया था मैंने सब कुछ अपना,
बदकिस्मती से हमें ज़िन्दगी ख़राब मिल गई।
गुमान करती हो अपनी सूरत देखकर जिसमें,
उस बेवफा आईने में हमें दरार मिल गई।
न जाने कब से मेरा उजड़ा हुआ चमन था ,
तुम आये तो फूल खिलने को बहार मिल गई।
मुझे रात में मिलता गया अँधेरा ही "ख़ामोश",
तुम निकले तो तुम्हे चांदनी जवान मिल गई।
.............................................................................
अमित कुमार "ख़ामोश"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
http://www.nilkhamos.blogspot.com