कुछ न खबर है मेरे यार की।
लगी तलब उनके दीदार की।
छिपा जो चाँद बादलों के पीछे,
हुयी साज़िश उनके फरार की।
भटकते फिरते शहर की गलियां,
कुछ न खबर मेरे दिलदार की।
टकरा गए नशे में चूर होकर के,
न कोई इसमे खता दीवार की।
हुयी "खामोश" मुहब्ब्त दोनों को,
ये आँखे बनी वजह इजहार की।
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अमित कुमार " खामोश"
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