कोई बात हो तो छिपाया न करो।
कोई राज दिल में दबाया न करो।
यूँ तो हर दर्द के हकीम हैं हम साकी,
सिर्फ तुम मेरे सामने आया न करो।
तुम ही हो गुनेहगार अपनी चोट के,
अपने आईने के सामने जाया न करो।
तुम मेरे पास आओ न आओ तुम्हारी मर्ज़ी,
निकलकर गली में सबको सताया न करो।
जो कहती हैं आँखे वो जुबाँ से भी कह दो,
कहेगा ज़माना आशिक़ों को आजमाया न करो।
मैं सींचता रहा खियाबां तमाम उम्र तक,
तुम तोड़कर फूल कांटा लगाया न करो।
हो जाते हैं कत्ल मासूम लोग भी देखकर,
तुम आंखों में काजल लगाया न करो।
इस कदर रोयेंगे तुम्हें पाने को "खामोश",
कहेगा फिर समुन्दर ऐसे तुम रोया न करो।
.............................................................
अमित कुमार उर्फ ख़ामोश
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
http://www.nilkhamos.blogspot.com