शनिवार, 18 अगस्त 2018

सामने मुहब्बत पीछे रंजिशें.........

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सामने मुहब्ब्त पीछे तो रंजिशें हैं।
महफ़िल-ए-वफ़ा- तो  साजिशें हैं।

रो कर रात भर दिन में हंसते हैं,
मरके जिंदा रहने की कोशिशें हैं।

जला दिए चिराग अंधेरी राहों में,
बढ़े कदम तो चलने की बंदिशें हैं।

आग दिल मे और धुंआ शहर है,
सबकी ज़िन्दगी में कुछ गर्दिशें हैं।

चीखते "खामोश" घर की लपटें देख,
आये सब लिए हाँथ में माचिशें हैं।
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                            अमित कुमार "खामोश"

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