http://www.nilkhamos.blogspot.com
खुश थे बहुत हम बीच यारों के।
फूल थे हम सब जैसे बहारों के।
कैसे थे मेरे यार न पूछो हमसे ये,
सुन लो किस्से बस सितारों के।
सजाते महफ़िल रोज बातों की,
होती सैर समुन्दर किनारों के।
होती थी शरारत समझदारी में,
उठाते फ़ायदा ईंट के दरारों के।
होता बक्त जब इम्तिहान का तो,
घूम आते मेले ख़ूब बाजारों के।
मार मार समझाना अदीब का वो,
एक बना देना हो बीच हज़ारों के।
निकालते आंसू चुपचाप अकेले में,
समझे हालात-ए-इंशा बिन सहारे के।
न गम न कोई शिकवा गिला था,
बनाते महल रेत पर लकीरों के।
बदला वक्त या बदल गया "खामोश",
खुशी नही मिलती पास जो फकीरों के।
.....................................................................
अमित कुमार "खामोश"
खुश थे बहुत हम बीच यारों के।
फूल थे हम सब जैसे बहारों के।
कैसे थे मेरे यार न पूछो हमसे ये,
सुन लो किस्से बस सितारों के।
सजाते महफ़िल रोज बातों की,
होती सैर समुन्दर किनारों के।
होती थी शरारत समझदारी में,
उठाते फ़ायदा ईंट के दरारों के।
होता बक्त जब इम्तिहान का तो,
घूम आते मेले ख़ूब बाजारों के।
मार मार समझाना अदीब का वो,
एक बना देना हो बीच हज़ारों के।
निकालते आंसू चुपचाप अकेले में,
समझे हालात-ए-इंशा बिन सहारे के।
न गम न कोई शिकवा गिला था,
बनाते महल रेत पर लकीरों के।
बदला वक्त या बदल गया "खामोश",
खुशी नही मिलती पास जो फकीरों के।
.....................................................................
अमित कुमार "खामोश"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
http://www.nilkhamos.blogspot.com