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कोई बात बे वजह नहीं होती।
रात न हो तो सुबह नहीं होती।
बात अगर मैदान-ए-जंग की हो तो,
बिन हार के फतह नहीं होती।
लिख दें बहुत लफ़्ज़-ए-मुहब्ब्त मगर,
ज़िक्र न हो तेरा वो ग़ज़ल नहीं होती।
बच जाते हैं लोग खंजर के वार से भी,
तेरी कातिल नजर सी कोई नजर नहीं होती।
लौट आये मौत से मिलकर "ख़ामोश" क्योंकि,
ख़ुदा की इनायत हर जगह नहीं होती।
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अमित कुमार "ख़ामोश"
कोई बात बे वजह नहीं होती।
रात न हो तो सुबह नहीं होती।
बात अगर मैदान-ए-जंग की हो तो,
बिन हार के फतह नहीं होती।
लिख दें बहुत लफ़्ज़-ए-मुहब्ब्त मगर,
ज़िक्र न हो तेरा वो ग़ज़ल नहीं होती।
बच जाते हैं लोग खंजर के वार से भी,
तेरी कातिल नजर सी कोई नजर नहीं होती।
लौट आये मौत से मिलकर "ख़ामोश" क्योंकि,
ख़ुदा की इनायत हर जगह नहीं होती।
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