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चलते चलते दिन में रात नजर आने लगी।
जो थी पास मंजिल वो दूर नजर आने लगी।
गम के पत्थरों ने रोक लिया था रास्ता मेरा,
खुली जगह में इक दीवार नजर आने लगी।
निकल आये कदम बहुत दूर वापस जाएँ कैसे,
समुन्दर की कश्ती तो आब नजर आने लगी।
मिल न सका जिसका देखा था ख्वाब पाने को,
देखा आसमां तो वँहा जमीन नजर आने लगी।
छोड़ जाएंगे साथ "खामोश" ऐसे तो न चाहा था,
पी कभी आंखों से वो शराब नजर आने लगी।
...............................................................................
*आब- पानी
अमित कुमार "खामोश"
चलते चलते दिन में रात नजर आने लगी।
जो थी पास मंजिल वो दूर नजर आने लगी।
गम के पत्थरों ने रोक लिया था रास्ता मेरा,
खुली जगह में इक दीवार नजर आने लगी।
निकल आये कदम बहुत दूर वापस जाएँ कैसे,
समुन्दर की कश्ती तो आब नजर आने लगी।
मिल न सका जिसका देखा था ख्वाब पाने को,
देखा आसमां तो वँहा जमीन नजर आने लगी।
छोड़ जाएंगे साथ "खामोश" ऐसे तो न चाहा था,
पी कभी आंखों से वो शराब नजर आने लगी।
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