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कोई चला गया कहीं मेरा दिल तोड़ कर।
फरार हो गया परिंदा आशियाना छोड़ कर।
जो करते बयाँ लफ्ज ए मुहब्बत जुबाँ से,
कैसे चले जाते हैं वो ऐसे मुँह मोड़ कर।
घूमता हूँ बंजारा बनकर न मिलेगा पता मेरा,
बना लेते हैं ठिकाना सबसे दिल जोड़ कर।
खता मेरी कि मैं सिर्फ उनको देखता हूँ,
गुजर जाते हैं मुझसे वो चेहरा फेर कर।
उम्र भर भागते रहते "ख़ामोश" उनके पीछे,
इक बार लग जाते मेरे गले वो दौड़ कर।
.................................................................................... अमित कुमार ख़ामोश
कोई चला गया कहीं मेरा दिल तोड़ कर।
फरार हो गया परिंदा आशियाना छोड़ कर।
जो करते बयाँ लफ्ज ए मुहब्बत जुबाँ से,
कैसे चले जाते हैं वो ऐसे मुँह मोड़ कर।
घूमता हूँ बंजारा बनकर न मिलेगा पता मेरा,
बना लेते हैं ठिकाना सबसे दिल जोड़ कर।
खता मेरी कि मैं सिर्फ उनको देखता हूँ,
गुजर जाते हैं मुझसे वो चेहरा फेर कर।
उम्र भर भागते रहते "ख़ामोश" उनके पीछे,
इक बार लग जाते मेरे गले वो दौड़ कर।
.................................................................................... अमित कुमार ख़ामोश
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