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होती नहीं मुलाकात उनसे अकेले में।
तन्हा मेरी ज़िंदगी होकर भी मेले में।
लगी है जो मेरे दिल जिगर में,
वो आग हो नहीं सकती शोले में।
आये मेरे पास बहाना आँसुओ का लेकर,
कम हो जाए मेरा गम शायद रोने में।
गुजर गयी मेरी सांसे वफ़ा करते करते,
लम्हा नहीं लगा उन्हें वेवफाई करने में।
लिये चलते हैं "ख़ामोश" दर्द ए दिल की दवा,
कहाँ देर लगती है किसी को जख्म देने में।
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अमित कुमार ख़ामोश
होती नहीं मुलाकात उनसे अकेले में।
तन्हा मेरी ज़िंदगी होकर भी मेले में।
लगी है जो मेरे दिल जिगर में,
वो आग हो नहीं सकती शोले में।
आये मेरे पास बहाना आँसुओ का लेकर,
कम हो जाए मेरा गम शायद रोने में।
गुजर गयी मेरी सांसे वफ़ा करते करते,
लम्हा नहीं लगा उन्हें वेवफाई करने में।
लिये चलते हैं "ख़ामोश" दर्द ए दिल की दवा,
कहाँ देर लगती है किसी को जख्म देने में।
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अमित कुमार ख़ामोश
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