शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

छोड़ गई साथ मेरा परछाई........

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छोड़ गई है मेरा साथ परछाई भी।
शायद नराज है मुझसे खुदाई भी।

चले जाते तुम कहीं भी मुझसे वादा करके,
सह लेते हम वो तुम्हारी जुदाई भी।

देते रहे तुम मुझे तमाम उम्र जख्म,
और कर दी मेरे नाम बेवफ़ाई भी।

ऐसे बर्बाद हुए तुम्हारी आशिकी में कि,
करेगी न आबाद किसी की रहनुमाई भी।

जब तक न आओगे "खामोश" तबियत देखने,
करेगी न असर मुझको कोई दवाई भी।
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                             अमित कुमार ख़ामोश

चलो साथ में मयकदा चलते.........

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चलो हम साथ में मयकदा चलते हैं।
जहाँ होंठों से नहीं जाम दिल से मिलते हैं।

हम बार बार झाँकते उनकी गली की तरफ,
कहते हैं वो की हम आवारगी करते हैं।


मैं जिंदा हुआ हूँ उनपे मर मिटने के बाद,
अफसोस कि वो किसी और पे मरते हैं।


किसी को मिलती नहीं खुशी किसी को खुश देखकर,
चिरागों की जगह तो वहां जिस्म जलते हैं।


मुमकिन नहीं जो राह ए मुहब्बत में "ख़ामोश",
ऐसी बात वो हमसे  ही कहते हैं।
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          अमित कुमार ख़ामोश


ग़ज़ल/नज्म.........मिल गया सकूँ हमें जब शराब......

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मिल गया सकूँ हमें जब शराब मिल गई।
अधूरी जो रह गई थी वो किताब मिल गई।

तुमको मान लिया था मैंने सब कुछ अपना,
बदकिस्मती से हमें ज़िन्दगी ख़राब मिल गई।

गुमान करती हो अपनी सूरत देखकर जिसमें,
उस बेवफा आईने में हमें दरार मिल गई।

न जाने कब से मेरा उजड़ा हुआ चमन था ,
तुम आये तो फूल खिलने को बहार मिल गई।

मुझे रात में मिलता गया अँधेरा ही "ख़ामोश",
तुम निकले तो तुम्हे चांदनी जवान मिल गई।
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                अमित कुमार "ख़ामोश"

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गज़ल/नज्म..............लगता है डर इजहार ए मुहब्बत......

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 लगता है डर इजहार ए मुहब्बत करने में।
 होती हैं कोशिशें जैसे जमानत करने में।

 दुनिया की भीड़ में मिला गम ही मुझको,
 मिलती खुशी मुझे तुमसे शरारत करने में।

 तुम मेरे हो जाओ अगर खुदा की कसम,
 हो जाऊं फ़ना मैं तुम्हारी हिफ़ाजत करने में।

 कर रहे हो गीली अपने आँसुओ से मेरी कब्र,
 तुमने देर कर दी मुझ पर इनायत करने में।

"ख़ामोश" खोलकर लहरा दो इक बार जुल्फों को,
 दे दो साथ अँधेरे का तुम क़यामत  करने में।
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                      अमित कुमार खामोश

गज़ल/नज्म।.......सोचता हूँ मशहूर.......

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सोचता कि मशहूर तुम्हारा नाम कर दूं।
अधूरी कहानी का खत्म अंजाम कर दूं।

आ न पाए सुबह तक कोई होश में,
इस कदर महफ़िल ए जाम कर दूं।

हौसला न तुम में दो कदम साथ चलने का,
अकेले मैं मुहब्बत के सारे काम कर दूं।

इजहार कर दो तुम जो सामने आकर के,
ऐसे इश्क में खुद को मैं बदनाम कर दूं।

चली गयी आदत "खामोश" वार करने की,
जिद पे आऊं तो कत्लेआम कर दूं।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

शेर..... न मैं बदला....

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न मैं बदला न मेरी फ़ितरत "ख़ामोश"
हाँ थोड़ा सा बदल गया है वक्त मेरा।

ग़ज़ल/नज्म................नहीं जाती खाली दुआ.........

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नहीं जाती दुआ खाली किसी गरीब की।
बदल जाती है जिंदगी बिगड़े नसीब की।

आंको न चेहरे को सबके दिल में रब है,
हो जायेगी बदनामी इंसा शरीफ की।

सब खफ़ा तुम्हारे अंदाज ए दिल्लगी से,
जरूरत तुम्हे तो दवा ए तहजीब की।

बीमार कर गये तुम यूँ सामने आकर,
छूकर न देखी तबियत भी तुमने मरीज की।

बहुत मिलता है "ख़ामोश" इश्क बांटने वालों को,
सिर्फ बददुआ न लेना कभी किसी फ़क़ीर की।
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                  अमित कुमार "ख़ामोश"

बुधवार, 29 अगस्त 2018

नज्म/ग़ज़ल..........लगी है भूख

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लगी है भूख आदमी को दौलत की।
बुझती नहीं प्यास कभी शोहरत की।

तुम जो कर दो अपने इश्क में फ़ना मुझको,
पूरी हो जायेगी मेरी ख्वाहिश जन्नत की।

कर न पाये हक़ीम दवा मरीज ए इश्क की,
जरूरत है तुम्हे अब ख़ुदा ए रहमत की।

पाने तुम्हारी चाहत निकल आएंगे कब्र से,
इंतजार है तो सिर्फ तुम्हारी इजाजत की।

हम जा रहे हमें मुस्कुरा के विदा करो "खामोश"
ठहर गये आँसू जो तुमने ऐसी अदावत की।
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                         अमित कुमार ख़ामोश

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ग़ज़ल/ नज्म.........चाँद को पाने से क्या........

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चाँद को पाने से रोकेगा क्या ज़माना मुझको।
तुम खुद ही बनाओगी अपना दीवाना मुझको।

बयाँ लफ़्ज़-ए-मुहब्बत हम कर जायँगे कुछ तो,
कहेगी इक दिन सारी दुनिया शायराना मुझको।

आता और जाता रहता है ये वक्त यूँ ही साहिब,
रहें बांकी निशा ऐसा बनाना है फसाना मुझको।

तुम उजाड़ोगे मेरा घर जब अपने वजूद के लिए,
दे दिया होगा किसी ने  दिल मे ठिकाना मुझको।

रूह तक निकलती नहीं "ख़ामोश" जिस्म से जो,
पास रहकर सिखा दिया तुमने तड़पाना मुझको।
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                         अमित कुमार ख़ामोश

ग़ज़ल/नज्म

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कुछ तो है उनके दिल में जो वो मुझसे बात करते हैं।
हाल इधर भी वही है जो हम भी उनसे बात करते हैं।


अगर इश्क है तो बयाँ कर दो तुम मुझसे,
चिराग अकेले तो नहीं आग करते हैं।

घुमा फिरा के पूछना मेरे हाल ए दिल का राज,
वो तो बस हमें यूँ ही बेताब करते हैं।

बहकने लगीं कश्तियां लहरों पे चलते चलते,
हमारी तरफ वो और उनकी तरफ हम हाथ करते हैं।

चले आओ मेरे पास तुम "ख़ामोश" तड़पकर,
तुम्हारे कदम अब मेरे दिल में आवाज करते हैं।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

ग़ज़ल/नज्म

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क़सूर शराब का हर बार नहीं होता।
नहीं होता नशा जब तक दीदार नहीं होता।

समझते हैं खुद को ख़ुदा आशिकी का,
मशहूर हैं जब तक निगाहों से वार नहीं होता।

निकला है बेपनाह हुस्न कयामत लाने कहीं,
हम पे गिरी बिजली ये हमें ऐतबार नहीं होता।

देखकर जिस्म कर दिया बदनाम मुहब्बत को,
ये इश्क-ए-ख़ुदा है कई बार नहीं होता।

जैसे हो तुम "ख़ामोश" वैसे ही नजर आओगे,
दूसरा कोई चेहरा आईने के पार नहीं होता।
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              अमित कुमार ख़ामोश


सोमवार, 27 अगस्त 2018

कुछ बीमार.......

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कुछ बीमार से लगते हो।
जब सामने मेरे आते हो।

मुरझाये फूल से तुम हो,
जब पलकें झपकते हो।

नशे में हो तुम शायद ,
जो कदम डगमगाते हो।

कर ली है दोस्ती आग से,
तुम सबके दिल जलाते हो।

गुजरते हो "ख़ामोश" तुम चमन से,
तब फूल तुम खिलाते हो।
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               अमित कुमार ख़ामोश

हर किसी को तुम .........

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हर किसी को तुम बीमार करती हो।
अपनी निगाहों से तुम शिकार करती हो।

करती हैं इशारा तुम्हारी आंखे बांहों में लेने को,
फिर भी तुम जुबां से इंकार करती हो।

हम क्या नाम दें तुम्हारी इस अदा का सनम,
तुम हर किसी से इश्क का इजहार करती हो।

इक बूंद न मिली मुझे तुम्हारी मुहब्बत की,
आकर सामने मुझे और बे करार करती हो।

मांगती इजाजत तुमसे "ख़ामोश" काली घटा,
अपने चेहरे पे जब जुल्फों की दीवार करती हो।
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                 अमित कुमार "ख़ामोश"

कोई बात बेवजह.......

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कोई बात बे वजह नहीं होती।
रात न हो तो सुबह नहीं होती।

बात अगर मैदान-ए-जंग की हो तो,
बिन हार के फतह नहीं होती।

लिख दें बहुत लफ़्ज़-ए-मुहब्ब्त मगर,
ज़िक्र न हो तेरा वो ग़ज़ल नहीं होती।

बच जाते हैं लोग खंजर के वार से भी,
तेरी कातिल नजर सी कोई नजर नहीं होती।

लौट आये मौत से मिलकर "ख़ामोश" क्योंकि,
ख़ुदा की इनायत हर जगह नहीं होती।
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            अमित कुमार "ख़ामोश"

रविवार, 26 अगस्त 2018

शायरी

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भीड़ बहुत है मेले में,
तन्हा सही हम अकेले में।
बनाते हैं कारवाँ खुद से "खामोश",
नहीं आदत चलना काफिले में।
...…...............................................
        अमित कुमार ख़ामोश

आ गया है जीना अब तो ........

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आ गया है जीना अब तो तुमसे से मिलके।
भूल गया हूँ मैं खुद को यूं तुम से मिलके।

हंसता है जमाना मुझ पर मेरी ये हालत देखकर,
हो  गया हूँ पागल जब लौटा तुमसे मिलके।

छोड़ दिया है सताना अब तो अंधेरो ने भी,
जब से सीखा जीना तुमसे मिल के।

उम्र भर न सताएंगी तेरी यादें मुझको,
हो गया हूँ बदनाम तेरे नाम से तुमसे मिलके।

भूल गए मुस्कुराना "खामोश" तेरी मुस्कान देखकर,
बिना साहिल भटक रहा समुन्दर में तुमसे मिलके।
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                      अमित कुमार खामोश

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

फायदा है....


फायदा है तिजारत-ए-मुहब्बतें,
बेवफा लूट लेते हैं सिद्दतें।

कर दिया तबाह इक पल में मकां,
बनाने में जिसको लगी थीं मुद्दतें।

छुपता निकलता है जैसे रोज चाँद,
हो गयी हैं ऐसी आदमी की फ़ितरतें।

झुकता ही नही दिल कभी सजदे में,
सिर्फ सर से हो रही हैं ईबादतें।

भरोसा रब की रहमतों पर है "खामोश",
यहां खुद के फ़ैसले हैं और खुद की अदालतें।
............................................................................
                  अमित कुमार "खामोश"

बुधवार, 22 अगस्त 2018

कुछ न खबर .....


  कुछ न खबर है मेरे यार की।
  लगी तलब उनके दीदार की।

   छिपा जो चाँद बादलों के पीछे,
   हुयी साज़िश उनके फरार की।

   भटकते फिरते शहर की गलियां,
   कुछ न खबर मेरे दिलदार की।

   टकरा गए नशे में चूर होकर के,
   न कोई इसमे खता दीवार की।

   हुयी "खामोश" मुहब्ब्त दोनों को,
   ये आँखे बनी वजह इजहार की।
....................................................................................
                  अमित कुमार " खामोश"
 

 


खुश थे बहुत हम.......

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खुश थे बहुत हम बीच यारों के।
फूल थे हम सब जैसे बहारों के।

कैसे थे मेरे यार न पूछो हमसे ये,
सुन लो किस्से बस सितारों के।

सजाते महफ़िल रोज बातों की,
होती सैर समुन्दर किनारों के।

होती थी शरारत समझदारी में,
उठाते फ़ायदा ईंट के दरारों के।

होता बक्त जब इम्तिहान का तो,
घूम आते मेले ख़ूब बाजारों के।

मार मार समझाना अदीब का वो,
एक बना देना हो बीच हज़ारों के।

निकालते आंसू चुपचाप अकेले में,
समझे हालात-ए-इंशा बिन सहारे के।

न गम न कोई शिकवा गिला था,
बनाते महल रेत पर लकीरों के।

बदला वक्त या बदल गया "खामोश",
खुशी नही मिलती पास जो फकीरों के।
.....................................................................
             अमित कुमार "खामोश"





कुछ न है खबर .....

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कुछ न है खबर मेरे यार की।
लगी तलब उनके दीदार की।

छिपा जो चाँद बादलों के पीछे,
साजिश उनके होने फरार की।

ढूंढ़ते रहे शहर की गलियों में,
कुछ खबर न मेरे दिलदार की।

टकरा गए नशे में चूर होकर,
इसमें न कोई खता दीवार की।

हुई "खामोश"मुहब्बत एक दूजे से,
ये आँखे बनी वजह इजहार की।
.................................................................................
                        अमित कुमार " खामोश"



हम थोड़े से हैं...........

www.nilkhamos.blogspot.com हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल। वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल। हम ...