सोमवार, 20 अगस्त 2018

न जाने किस बात पे.......

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न जाने किस बात पर  वो  जफ़ा करते हैं।
जितना होते दूर हम उतनी वफ़ा करते हैं।

आजमाने को मेरी मुहब्ब्त तरीका ढूंढ़ते हैं,
होकर नादान कोई न कोई खता करते हैं।

समेटके नफ़रत समझते हैं खुद को अर्जमंद,
बिखेरके मुहब्ब्त हम अपना नफा करते हैं।

चुका न  पाए एहसान तुम्हारी रहमतों का,
उतार दूँ एक तो दो और बोझ लदा करते हैं।

घूमते फिरते "खामोश" राह बनी ठिकाना,
यहाँ मंदिर है इश्क का सबाब बटा करते हैं।
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*अर्जमन्द- महान
                       अमित कुमार "खामोश"

करके हासिल मंजिल............

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करके हासिल  मंजिल दुनिया को दिखाना  है।
कहे जब जमाना ये तो बड़ा अजीब दीवाना है।

डूब  जाते हैं कुछ  लोग समुन्दर की लहरों से,
निकालना कश्ती तूफ़ान से सबको सिखाना है।

गुजार देते हैं ताउम्र एक ख्वाहिश पूरी करने में,
तुमको तो हजारों कामयाबियों से मिलाना है।

जो बात है तुम में वो किसी में हो नही सकती,
फिर तुम्हेअपनी शोहरत को याद दिलाना है।

ग़मज़दा हो भी गए तो परवाह न की "खामोश",
हरा के खुद को किसी चेहरे को जिताना है।
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          अमित कुमार " खामोश"

देखने नज़ारा जी उठे .......

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देखने नज़ारा जी  उठे हम  कफ़न से।
सरकी जब बूंद पानी उनके दामन से।

देख लपटें उनके अंग अंग से तो सोचा,
बुझा दूँ आग लिपट के उनके बदन से।

हुआ सामना जब वो निकले पानी से,
जैसे मिल गया हो फूल कोई चमन से।

सुखा दूँ जुल्फें अपनी गरम सांसो से,
कुछ  ऐसा ख्याल आया मेरे जहन से।

काश ये ख्वाब सच हो जाये "खामोश",
रह कर जिंदा हम हों जाएँ दफन से।
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         अमित कुमार  "खामोश"

बेमुहब्बत जिंदगी के मायने क्या.......

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बेमुहब्बत जिंदगी के मायने क्या।
होआवारगी तो फिर कायदे क्या।

तलब है कुछ नशा हो जाए मुझे,
सामने तुम तो जाना मैकदे क्या।

लेकर मेरा दिल तुम खुश नही तो,
सच बता तो की तुम चाहते क्या।

झुक गए सर इबादत के लिए सब,
निकले न दुआ ऐसे सजदे  क्या।

सुबह होश में आ जाएं "खामोश",
ऐसी शराब पीने से फायदे क्या।
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               अमित कुमार "खामोश"

रविवार, 19 अगस्त 2018

आरजू है तुझे...

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मेरी अतीत है तू...

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कुछ अलग......

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कुछ अलग कर जाने की जिद है हमारी।
कारवाँ में चलने की आदत नहीं है हमारी।
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                     अमित कुमार" खामोश"

छुप छुप देखते थे........

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छुपकर देखते थे सरे आम हुऐ।
गली से गुजरे तो बद नाम हुए।

मिला दर्द जब गम से रूबरू हुए,
खुशी के लिए जाम पे जाम हुए।

हर अंग कयामत है ये सुना है,
निग़ाहों से सब कत्ले आम हुए।

अलग अंदाज चाहे आजमा लेना,
जो तुम्हे चाहने वाले तमाम हुए।

बहाना ढूढ़ते तेेरे दीदार के लिए,
तेरे घर के सामने मेरे काम हुए।

"खामोश' मुहब्ब्त सही इजहार से,
हम आबाद और कुछ गुम नाम हुए।
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                         अमित कुमार "खामोश"

जिनकी बदल नहीं...........

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जब बदल नहीं सकती  फ़ितरत।
उनसे हो ही नहीं सकती इबादत।

अमल न बातों का जिंदगी में किया,
कभी कबूल हो नहीं सकती जियारत।

इश्क है सच्चा जिनको ख़ुदा से ही,
उनसे हो ही नहीं सकती हिमाकत।

दिल में कुछ और होंठों पे कुछ और,
वो दुआ कर नहीं सकती हिफ़ाजत।

लेकर वफ़ा "खामोश" देते हैं बेवफ़ाई,
मुहब्बत ए खुदा कर नहीं सकती तिजारत।
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*फ़ितरत- चालबाजी
*जियारत- तीर्थयात्रा
*हिमाकत- मूर्खता
*तिजारत-वयापार।                 अमित कुमार " खामोश"


चलते चलते दिन में.........

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चलते चलते दिन में रात नजर  आने लगी।
जो थी पास मंजिल वो दूर नजर आने लगी।

गम के पत्थरों ने रोक लिया था रास्ता मेरा,
खुली जगह में इक दीवार नजर आने लगी।

निकल आये कदम बहुत दूर वापस जाएँ कैसे,
समुन्दर की कश्ती तो आब नजर आने लगी।

मिल न सका जिसका देखा था ख्वाब पाने को,
देखा आसमां तो वँहा जमीन नजर आने लगी।

छोड़ जाएंगे साथ "खामोश" ऐसे तो न चाहा था,
पी  कभी आंखों से वो शराब नजर आने लगी।
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  *आब- पानी
                                         अमित कुमार "खामोश"

खूबसूरत हैं ये बात...........

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खूबसूरत हैं ये बात उन्हें आईने से पता चली।
बुझाने किसी की प्यास बादलों की घटा चली।

गिर गईं बिजलियां जो गुजरे उनके सामने से,
कसूरवार वो  थे ये मालूम उनकी जफ़ा चली।

कुछ न कह पाये होंठो से सामने जब मेरे आये,
कुछ इशारे थे हमें ये उनकी आंख बता चली।

लिपटे रहे हम दोनों एक दूसरे के आगोश में,
छोड़कर खुसबू बदन की वो हर सबूत मिटा चली।

होगा एक ही चाँद आसमां या जमीं पर "खामोश",
ये बात यहाँ अदालत-ए-आशिक कई दफा चली।
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                               अमित कुमार"खामोश"

शनिवार, 18 अगस्त 2018

सामने मुहब्बत पीछे रंजिशें.........

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सामने मुहब्ब्त पीछे तो रंजिशें हैं।
महफ़िल-ए-वफ़ा- तो  साजिशें हैं।

रो कर रात भर दिन में हंसते हैं,
मरके जिंदा रहने की कोशिशें हैं।

जला दिए चिराग अंधेरी राहों में,
बढ़े कदम तो चलने की बंदिशें हैं।

आग दिल मे और धुंआ शहर है,
सबकी ज़िन्दगी में कुछ गर्दिशें हैं।

चीखते "खामोश" घर की लपटें देख,
आये सब लिए हाँथ में माचिशें हैं।
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                            अमित कुमार "खामोश"

था इंतजार सदियों से.......

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था इंतजार सदियों से तब दीदार हुए।
था सामने हकीम और हम बीमार हुए।

दिया दर्द काँटो से ज्यादा बातों ने मुझको,
जाल मेरा था फिर भी उनके शिकार हुए।

खाई थी कसमें हसीन मंजिल पाने को साथ,
वो मलिका-ए-हुस्न हुई और हम बेकार हुए।

लाश बन गया जिस्म जुदा रूह से होकर,
हम जमीन हवाले वो औरों पे निसार हुए।

सच थी "खामोश"आशिकी हाल लेने जो आये,
खोदने को कब्र मेरी उनके हाथ औजार हुए।
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                    अमित कुमार "खामोश"




गुजर जाएंगे गम के बादल ऐसा  वक्त तो आएगा।
सुधर जाएंगे बहकने से दिल ऐसा सख्त हो जाएगा।

चल रहा कारवाँ मुफ़लिसों का आगे आगे हम हैं, 
नफ़रत-ए-कत्ल से हासिल मुहब्बत का तख्त हो जाएगा।

बिछा दो राहों में जज्बातों को  मेरा महबूब आएगा,
गुजर गए सिर्फ  वो गली से तो मेरा बख्त हो जाएगा।

खुद बिखर गए "खामोश" इस ज़माने को संभालकर,
मिट गया ज़िस्म क्या हुआ नाम तो जब्त हो जाएगा।
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* बख्त- सौभाग्य
* तख्त-सिंहासन
                                   अमित कुमार "खामोश"

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

जो मिली न किसी को.........

जो मिली न थी किसी को , वो खुशी मिल गयी।
निकला जो बांटने दर्द , दुनिया दुखी मिल गयी।

तराशते रहे जिस घर को ताउम्र मेहनत से हम,
कोई जबर कहता , कहीं दीवार झुकी मिल गयी।

बेसब्र इंतजार सबको मेरा रौनक-ए-दरबार मे,
वो आये पहले और मुझे महफ़िल लुटी मिल गयी।

मुहब्बत शिद्दत से थी फिर भी कुछ डर था मुझे,
हो मुलाकात तो चांदनी चाँद की छुपी मिल गयी।

सब  परेशान "खामोश" किसी न किसी गम से,
कहीं जल रहे दिये कहीं शमा बुझी मिल गयी।
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* जबर- उत्तम
                       अमित कुमार" खामोश"

न कुछ कर सके तो..........

  न कुछ कर सके तो हम दुआ दे जाएंगे।
  सीखा दूंगा जीना जो मेरी कब्र पे आएंगे।।

  मिलता है सकूँ अब पत्थर पर सो कर,
  बदले में अपनी मौत के जिंदगी दे जाएंगे।

  कुछ ख्वाहिशें जो थीं वो अधूरी सी थीं,
  सबने कहा कुछ न ज़माने से हम ले पाएंगे।

  सब करते हैं गुस्ताखियां वो हमने भी कीं,
  जो खुद ही थे गलत वो अब सजा दे जाएंगे।

  अकेले ही सही "खामोश" झूठी मुहब्बत से,
  दवा न दे पाए सही पर हम दर्द कम दे जाएंगे।
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                             अमित कुमार" खामोश"
 
 

समझ न पाया ज़िन्दगी को.........

  समझ न पाए हम जिंदगी को करीब से।
  करता रहा कोशिशें पर हासिल नसीब से।

  कर दी दफन ख्वाहिशें जिंदा रहते ही,
  आकर मिली मौत मुझसे बड़े तहजीब से।

  न थी पास दौलत तो मुहब्बत बांटता गया,
   इस कदर जीत गया यूँ पागल अदीब से।

   दिल में तस्वीर बसी थी जिनकी ज़माने से,
   सामने वो जब आये तो थे कुछ अजीब से।

   ऐसे न थे "खामोश" की बेवफा हो जाएंगे,
   रोये चुपचाप जब देखा मिलते उनको रकीब से।
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                                         अमित कुमार "खामोश"
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   * अदीब- विद्धवान
    * रकीब- दूसरा प्रेमी

आ गए पास मौत..........

   ठहर गए हम मौत के पास तुमसे दूर रह कर।
   गम देते आगे कहानी में तुम इन्तजार कह कर।

   मिल के बिछड़ना, बिछड़ के मिलना कब तक,
   कर दो खत्म दर्द-ए-दिल तुम मेरे पास आ कर।

   बन न जाये ये शहर की दूरी कहीं दिल की दूरी,
   पा लूंगा तुम्हे अगली बार इस ज़िन्दगी में मर कर।

   बंदिशें कर रहीं कैद हम दोनों को धीरे धीरे से,
   इन्तजार जब तक जिस्म हो न जाये खाक जल कर।

   सुनाते रहेंगे "खामोश" मजबूरी अपने हालात की,
   बिखर जाएगा जो देखा था ख्वाब तुमसे जुदा हो कर।
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                           अमित कुमार " ख़ामोश"

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

कर गई तबाह.........

   कर गई तबाह तेरी मुहब्बत  मुझको।
   दिखी थी तुम में कभी ज़न्नत मुझको।

   कहाँ जाए टूटे दिल,पस्त हौसलों को लेकर,
    सम्हल जाते थे कभी हम देखकर तुमको।

    रह न पाओगे एक पल मेरे बिना तुम अकेले,
    हो न हिफाजत तो सौंप देना मेरा दिल मुझको।

    पाल रखे हैं बड़े बड़े शौक अजीब से तुमने,
    समझदारी नादानी में भी हो मुबारक तुमको।

    कर दिया मशहूर बेवफाई को वफ़ा के नाम पर,
    किया था इश्क दोनो ने बदनाम कर दिया मुझको।
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                               अमित कुमार "खामोश"

होश खो बैठे..............

   होश खो बैठे तुम्हे देखने वाले।
   मशहूर हो गए तुम्हे चाहने वाले।

   न बच सके तुम्हारी तिरछी नज़रों से,
   जो बदनाम थे कभी कत्ल करने वाले।

   पीते गए हम जाम पे जाम नशा न हुआ,
   हुए मदहोश तुम्हारे पास से गुजरने वाले।

   सबकी ख्वाहिश-ए-हासिल तुम क्यों न हो,
   मांगते सांसे तेरे दीदार को कब्र में रहने वाले।

   खता हो गई "खामोश" चिराग़ों से दोस्ती करके,
   मिल गई रोशनी सबको तुम्हारे साथ चलने वाले।
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                                अमित कुमार"खामोश"

हम थोड़े से हैं...........

www.nilkhamos.blogspot.com हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल। वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल। हम ...