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हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल।
वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल।
हम दखल जो देते रहें हैं तुम्हारी हर बात पे,
ऐसे तो नहीं कर सकता मैं कभी तुम्हे हासिल।
कसम से न आऊंगा दुबारा लौटकर तुम्हारी ज़िन्दगी में,
सिर्फ कर लो अपने दिल में मुझे जरा सा शामिल।
मुझे हर गुनाह क़बूल अब सजा दो तुम मुझे,
दिन में खाता हूं ठोकरें बिन तुम्हारे रात है बोझिल।
तुम्हारी वफाओं की सुनानी है कहानी "ख़ामोश" जहाँ को,
सामने आ जाओ तुम यार एक बार बन के मेरे कातिल।
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अमित कुमार ख़ामोश
हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल।
वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल।
हम दखल जो देते रहें हैं तुम्हारी हर बात पे,
ऐसे तो नहीं कर सकता मैं कभी तुम्हे हासिल।
कसम से न आऊंगा दुबारा लौटकर तुम्हारी ज़िन्दगी में,
सिर्फ कर लो अपने दिल में मुझे जरा सा शामिल।
मुझे हर गुनाह क़बूल अब सजा दो तुम मुझे,
दिन में खाता हूं ठोकरें बिन तुम्हारे रात है बोझिल।
तुम्हारी वफाओं की सुनानी है कहानी "ख़ामोश" जहाँ को,
सामने आ जाओ तुम यार एक बार बन के मेरे कातिल।
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अमित कुमार ख़ामोश