बुधवार, 12 सितंबर 2018

हम थोड़े से हैं...........

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हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल।
वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल।


हम दखल जो देते रहें हैं तुम्हारी हर बात पे,
ऐसे तो नहीं कर सकता मैं कभी तुम्हे हासिल।


कसम से न आऊंगा दुबारा लौटकर तुम्हारी ज़िन्दगी में,
सिर्फ कर लो अपने दिल में मुझे जरा सा शामिल।


मुझे हर गुनाह क़बूल अब सजा दो तुम मुझे,
दिन में खाता हूं ठोकरें बिन तुम्हारे रात है बोझिल।


तुम्हारी वफाओं की सुनानी है कहानी "ख़ामोश" जहाँ को,
सामने आ जाओ तुम यार एक बार बन के मेरे कातिल।
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                     अमित कुमार ख़ामोश

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

सोचता हूँ कि......

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सोचता हूँ कि उनसे इश्क का इजहार कर दूँ,
अपनी मुहब्बत में उनको बेकरार कर दूँ।
कब का छोड़ दिया मैंने करना कत्ल वरना,
मैं तो निगाहों से शिकार कर दूँ।
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            अमित कुमार ख़ामोश

बुधवार, 5 सितंबर 2018

वो कहते हैं कि उनके.................

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वो कहते हैं कि उनके बिना हम नहीं जी पाएंगे।
हम वो हैं कि जहर शराब में मिलाकर पी जाएंगे।

हम हुए सबके सामने साबित गुनेहगार तो,
बनकर गवाह अदालत वो भी जाएंगे।

थका सा चाँद बुझी रोशनी बोझिल सी ये रात,
कह दो आ जाएं वो तो चिराग़ फिर जी जाएंगे।

मंजूर नहीं हमको जो सज़ा ज़माने ने मुझे दे दी,
कराने कत्ल हम उनकी नज़रों के सामने ही जायेंगे।

छोड़ दो साथ गम न होगा "ख़ामोश" दिल को मगर,
दोस्त समुन्दर को अपनी आंखों का दे पानी जाएंगे।
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            अमित कुमार ख़ामोश

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

वो मेरे दर्द की इंतिन्हा..................

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वो मेरे दर्द की इंतिन्हां देखेंगे।
वो मेरी सब मजबूरियां देखेंगे।

जलाकर सबके दिल ओ जिस्म,
वो कई रोशनियां देखेंगे।

रहकर जश्न ए महफ़िल में,
वो मेरी तन्हाइयां देखेंगे।

होकर आबाद इस जहां में,
वो मेरी बरबादियां देखेंगे।

तुम निकले सैलाब लेकर जो " ख़ामोश",
वो राह में तबाहियां देखेंगे।
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                   अमित कुमार ख़ामोश

तुम ही से तो मेरा........

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तुम ही से तो मेरा वजूद है।
धड़कना दिल इसका सबूत है।


ढूँढते तुमको फ़िरते सब इबादत खाने में,
खुद को ढूँढते हम बस इतना जरूर है।



लगया न गले हमने किसी को मुहब्बत से,
बनाकर आदमी मुझको तुमने की करतूत है।



बसा लेंगें तुमको अपने मकान ए इश्क में,
माना जिस्म कमजोर मगर दिल मजबूत है।



रूठ गए तुम  तो "ख़ामोश" किधर जाएंगे,
कैसे उतरेगा चढ़ा मुझपे तुम्हरा जो सरूर है।
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                  अमित कुमार ख़ामोश


कोई चला गया कहीं मेरा .........

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कोई चला गया कहीं मेरा दिल तोड़ कर।
फरार हो गया परिंदा आशियाना छोड़ कर।


जो करते बयाँ लफ्ज ए मुहब्बत जुबाँ से,
कैसे चले जाते हैं वो ऐसे मुँह मोड़ कर।


घूमता हूँ बंजारा बनकर न मिलेगा पता मेरा,
बना लेते हैं ठिकाना सबसे दिल जोड़ कर।


खता मेरी कि मैं सिर्फ उनको देखता हूँ,
गुजर जाते हैं मुझसे वो चेहरा फेर कर।


उम्र भर भागते रहते "ख़ामोश" उनके पीछे,
इक बार लग जाते मेरे गले वो दौड़ कर।
....................................................................................                          अमित कुमार ख़ामोश




सोमवार, 3 सितंबर 2018

मेरे मिट जाएं गम कुछ ............

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मेरे मिट जाएं गम तुम ऐसा कर दो।
कुछ न सही तो अपने  जैसा कर दो।


तुम्हारे पहलू में सम्हल जाए मेरा दिल,
इतना सा फायदा तुम मेरा कर दो।


देकर पनाह सबको अपनी महफ़िल में,
जो बेघर हैं उन्हें तुम सहारा कर दो।


छिपाते फ़िरते हैं वो जमाने से इश्क तो,
बयाँ न लफ्जों में तो आंख से इशारा कर दो।


क्या है "ख़ामोश" जो तुम न कर सको,
नजरों से तुम दुश्मन को भी अपना कर दो।
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                  अमित कुमार ख़ामोश




शनिवार, 1 सितंबर 2018

लौट आना मेरे पास जब शाम हो..........

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लौट आना मेरे पास जब शाम हो जाये।
अधूरा जो रह गया वो मेरा काम हो जाये।

हर कोई चाहता है तुमसे दिल्लगी करना,
करेंगे हम ऐसी दोस्ती कि नाम हो जाये।

सब आते हैं पूछने मेरे दर्द ए दिल की वजह,
डरता हूँ बताने से कहीं वो न बदनाम हो जाये।

तुम्हारे साथ रहकर हमें होता था जो नशा,
मिलता नहीं कोई अब जिसके साथ इक जाम हो जाये।

ढूंढ़ते फिरते हैं "ख़ामोश" मेरे जैसा कोई आशिक,
देखें कहीं कोई आज फिर सरेआम हो जाये।
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           अमित कुमार ख़ामोश




होती नहीं मुलाकात उनसे...........

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होती नहीं मुलाकात उनसे अकेले में।
तन्हा मेरी ज़िंदगी  होकर भी मेले में।

लगी है जो मेरे दिल जिगर में,
वो आग हो नहीं सकती शोले में।

आये मेरे पास बहाना आँसुओ का लेकर,
कम हो जाए मेरा गम शायद रोने में।

गुजर गयी मेरी सांसे वफ़ा करते करते,
लम्हा नहीं लगा उन्हें वेवफाई करने में।

लिये चलते हैं "ख़ामोश" दर्द ए दिल की दवा,
कहाँ देर लगती है किसी को जख्म देने में।
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                       अमित कुमार ख़ामोश

तेरी नजरों का तीर............

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तेरी नजरों का तीर जो मेरी ओर चला था।
मैं लेने मरहम ए जख्म तेरी ओर चला था।

मैंने खाई चोट खुद ही दीवार बनकर,
जिस कदर होकर मैं नशे में चूर चला था।

कर ली दुनिया हासिल जिसने अपने दम पर,
हकीकत में वो जमीं से बहुत दूर चला था।

उतारी जब तुमने अपनी कश्ती दरिया में तो,
किनारा तब समुन्दर का मैं छोड़ चला था।

कमजोर मकां में रहने वाले मजबूत दिल होते थे,
इस जहाँ में भी "ख़ामोश" ऐसा दौर चला था।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

छोड़ गई साथ मेरा परछाई........

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छोड़ गई है मेरा साथ परछाई भी।
शायद नराज है मुझसे खुदाई भी।

चले जाते तुम कहीं भी मुझसे वादा करके,
सह लेते हम वो तुम्हारी जुदाई भी।

देते रहे तुम मुझे तमाम उम्र जख्म,
और कर दी मेरे नाम बेवफ़ाई भी।

ऐसे बर्बाद हुए तुम्हारी आशिकी में कि,
करेगी न आबाद किसी की रहनुमाई भी।

जब तक न आओगे "खामोश" तबियत देखने,
करेगी न असर मुझको कोई दवाई भी।
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                             अमित कुमार ख़ामोश

चलो साथ में मयकदा चलते.........

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चलो हम साथ में मयकदा चलते हैं।
जहाँ होंठों से नहीं जाम दिल से मिलते हैं।

हम बार बार झाँकते उनकी गली की तरफ,
कहते हैं वो की हम आवारगी करते हैं।


मैं जिंदा हुआ हूँ उनपे मर मिटने के बाद,
अफसोस कि वो किसी और पे मरते हैं।


किसी को मिलती नहीं खुशी किसी को खुश देखकर,
चिरागों की जगह तो वहां जिस्म जलते हैं।


मुमकिन नहीं जो राह ए मुहब्बत में "ख़ामोश",
ऐसी बात वो हमसे  ही कहते हैं।
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          अमित कुमार ख़ामोश


ग़ज़ल/नज्म.........मिल गया सकूँ हमें जब शराब......

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मिल गया सकूँ हमें जब शराब मिल गई।
अधूरी जो रह गई थी वो किताब मिल गई।

तुमको मान लिया था मैंने सब कुछ अपना,
बदकिस्मती से हमें ज़िन्दगी ख़राब मिल गई।

गुमान करती हो अपनी सूरत देखकर जिसमें,
उस बेवफा आईने में हमें दरार मिल गई।

न जाने कब से मेरा उजड़ा हुआ चमन था ,
तुम आये तो फूल खिलने को बहार मिल गई।

मुझे रात में मिलता गया अँधेरा ही "ख़ामोश",
तुम निकले तो तुम्हे चांदनी जवान मिल गई।
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                अमित कुमार "ख़ामोश"

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गज़ल/नज्म..............लगता है डर इजहार ए मुहब्बत......

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 लगता है डर इजहार ए मुहब्बत करने में।
 होती हैं कोशिशें जैसे जमानत करने में।

 दुनिया की भीड़ में मिला गम ही मुझको,
 मिलती खुशी मुझे तुमसे शरारत करने में।

 तुम मेरे हो जाओ अगर खुदा की कसम,
 हो जाऊं फ़ना मैं तुम्हारी हिफ़ाजत करने में।

 कर रहे हो गीली अपने आँसुओ से मेरी कब्र,
 तुमने देर कर दी मुझ पर इनायत करने में।

"ख़ामोश" खोलकर लहरा दो इक बार जुल्फों को,
 दे दो साथ अँधेरे का तुम क़यामत  करने में।
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                      अमित कुमार खामोश

गज़ल/नज्म।.......सोचता हूँ मशहूर.......

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सोचता कि मशहूर तुम्हारा नाम कर दूं।
अधूरी कहानी का खत्म अंजाम कर दूं।

आ न पाए सुबह तक कोई होश में,
इस कदर महफ़िल ए जाम कर दूं।

हौसला न तुम में दो कदम साथ चलने का,
अकेले मैं मुहब्बत के सारे काम कर दूं।

इजहार कर दो तुम जो सामने आकर के,
ऐसे इश्क में खुद को मैं बदनाम कर दूं।

चली गयी आदत "खामोश" वार करने की,
जिद पे आऊं तो कत्लेआम कर दूं।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

शेर..... न मैं बदला....

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न मैं बदला न मेरी फ़ितरत "ख़ामोश"
हाँ थोड़ा सा बदल गया है वक्त मेरा।

ग़ज़ल/नज्म................नहीं जाती खाली दुआ.........

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नहीं जाती दुआ खाली किसी गरीब की।
बदल जाती है जिंदगी बिगड़े नसीब की।

आंको न चेहरे को सबके दिल में रब है,
हो जायेगी बदनामी इंसा शरीफ की।

सब खफ़ा तुम्हारे अंदाज ए दिल्लगी से,
जरूरत तुम्हे तो दवा ए तहजीब की।

बीमार कर गये तुम यूँ सामने आकर,
छूकर न देखी तबियत भी तुमने मरीज की।

बहुत मिलता है "ख़ामोश" इश्क बांटने वालों को,
सिर्फ बददुआ न लेना कभी किसी फ़क़ीर की।
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                  अमित कुमार "ख़ामोश"

बुधवार, 29 अगस्त 2018

नज्म/ग़ज़ल..........लगी है भूख

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लगी है भूख आदमी को दौलत की।
बुझती नहीं प्यास कभी शोहरत की।

तुम जो कर दो अपने इश्क में फ़ना मुझको,
पूरी हो जायेगी मेरी ख्वाहिश जन्नत की।

कर न पाये हक़ीम दवा मरीज ए इश्क की,
जरूरत है तुम्हे अब ख़ुदा ए रहमत की।

पाने तुम्हारी चाहत निकल आएंगे कब्र से,
इंतजार है तो सिर्फ तुम्हारी इजाजत की।

हम जा रहे हमें मुस्कुरा के विदा करो "खामोश"
ठहर गये आँसू जो तुमने ऐसी अदावत की।
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                         अमित कुमार ख़ामोश

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ग़ज़ल/ नज्म.........चाँद को पाने से क्या........

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चाँद को पाने से रोकेगा क्या ज़माना मुझको।
तुम खुद ही बनाओगी अपना दीवाना मुझको।

बयाँ लफ़्ज़-ए-मुहब्बत हम कर जायँगे कुछ तो,
कहेगी इक दिन सारी दुनिया शायराना मुझको।

आता और जाता रहता है ये वक्त यूँ ही साहिब,
रहें बांकी निशा ऐसा बनाना है फसाना मुझको।

तुम उजाड़ोगे मेरा घर जब अपने वजूद के लिए,
दे दिया होगा किसी ने  दिल मे ठिकाना मुझको।

रूह तक निकलती नहीं "ख़ामोश" जिस्म से जो,
पास रहकर सिखा दिया तुमने तड़पाना मुझको।
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                         अमित कुमार ख़ामोश

ग़ज़ल/नज्म

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कुछ तो है उनके दिल में जो वो मुझसे बात करते हैं।
हाल इधर भी वही है जो हम भी उनसे बात करते हैं।


अगर इश्क है तो बयाँ कर दो तुम मुझसे,
चिराग अकेले तो नहीं आग करते हैं।

घुमा फिरा के पूछना मेरे हाल ए दिल का राज,
वो तो बस हमें यूँ ही बेताब करते हैं।

बहकने लगीं कश्तियां लहरों पे चलते चलते,
हमारी तरफ वो और उनकी तरफ हम हाथ करते हैं।

चले आओ मेरे पास तुम "ख़ामोश" तड़पकर,
तुम्हारे कदम अब मेरे दिल में आवाज करते हैं।
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                 अमित कुमार ख़ामोश

हम थोड़े से हैं...........

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