कम नहीं किसी खंज़र से तुम्हारी अदाएं।
तैयार मर मिटने को सब लेने तुम्हारी जफाएँ।
न जाने क्यों नहीं होती वक्त पे ये बारिश,
बुझा दो सबकी प्यास तुम लहरा के लटाये।
कैद हुए जंजीरो में हम अपनी बेगुनाही पे ,
तुम्हारे आशिक हैं जो बख़्सते तुम्हारी खतायें।
सोचता हूँ मैं देखकर तुम्हारे हसीन चेहरे को,
क्या रंग लाएंगी जिंदगी में तुम्हारी वफ़ाएँ।
सुनकर " खामोश" चर्चे शहर में जवानी के,
हुए पागल हम चली इश्क की जो तुम्हारी हवाएँ।
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अमित कुमार " खामोश"
तैयार मर मिटने को सब लेने तुम्हारी जफाएँ।
न जाने क्यों नहीं होती वक्त पे ये बारिश,
बुझा दो सबकी प्यास तुम लहरा के लटाये।
कैद हुए जंजीरो में हम अपनी बेगुनाही पे ,
तुम्हारे आशिक हैं जो बख़्सते तुम्हारी खतायें।
सोचता हूँ मैं देखकर तुम्हारे हसीन चेहरे को,
क्या रंग लाएंगी जिंदगी में तुम्हारी वफ़ाएँ।
सुनकर " खामोश" चर्चे शहर में जवानी के,
हुए पागल हम चली इश्क की जो तुम्हारी हवाएँ।
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अमित कुमार " खामोश"