बुधवार, 15 अगस्त 2018

कम नहीं किसी खंजर से ......

 कम नहीं किसी खंज़र से तुम्हारी अदाएं।
 तैयार मर मिटने को सब लेने तुम्हारी जफाएँ।

  न जाने क्यों नहीं होती वक्त पे ये बारिश,
  बुझा दो सबकी प्यास तुम लहरा के लटाये।

  कैद हुए जंजीरो में हम अपनी बेगुनाही पे ,
  तुम्हारे आशिक हैं जो बख़्सते तुम्हारी खतायें।

  सोचता हूँ मैं देखकर तुम्हारे हसीन चेहरे को,
  क्या रंग लाएंगी जिंदगी में तुम्हारी वफ़ाएँ।

  सुनकर " खामोश" चर्चे शहर में जवानी के,
  हुए पागल हम  चली इश्क की जो तुम्हारी हवाएँ।
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                    अमित कुमार " खामोश"

कुछ दर्द है सीने में..........

कुछ दर्द है सीने में कुछ तमन्नाएं हैं अधूरी।
जिंदगी कुछ कम है और दिल की है बेक़सूरी।

शिकवा है खुद से, गिला नहीं कोई ज़माने से,
ज़िंदा किसी की मेहरबानी से, नहीं है मजबूरी।

सीखा दिल से जीना जिंदगी की सुबह शाम को,
फिर भी दिन कटता नहीं, कहीं तो है दुश्वारी।

चलना सीख गए अंधेरो में  तुम्हे इस तरह पाकर,
कदम बहक जाते होश में तुम याद न करो जब हमारी।

तो क्या हुआ "खामोश" जो मंजिल गुमराह कर गई,
शहंसाओ की ज़िंदगी में भी अब जरूरी है फकीरी।
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                  अमित कुमार "खामोश"

जो दिल की गहराई......

 जो दिल की गहराई को समझ सकता नही,
 दरिया मुहब्बत का कभी पार कर सकता नहीं।
 मिल जाते हैं वफ़ा करने वाले राहों में क्योंकि,
दिलजला है "खामोश" मगर दिल जला सकता नहीं।

तेरे पास रहकर भी........


तेरे पास रहकर भी हम बहुत दूर हो गए हैं।
क्या बात मंजिलो की जब रास्ते  खो गए हैं।

तोड़ दूँ जंजीरे ऐसा हौसला बाकी है मुझमे,
हम कैद फिर भी और वो फरार हो गए हैं।

पाने को तेरा हुस्न हो जाती हैं तबाहियां,
न पीने वाले शराब, देख तुझे नशे में हो गए हैं।

बदल दिया ठिकाना बहुत दूर तेरे शहर से,
गुजरते थे तेरी गली से वो बदनाम हो गए हैं।

दिल की बात है दिल में "खामोश" कहें किस से,
जो कहते थे कभी अपना वो पराये हो गए हैं।
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                     अमित कुमार "खामोश"


मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या लोगी कीमत......

क्या लोगी तुम कीमत मुझे अपना बनाने की।
देने के अलावा सांसे हैसीयत नहीं दीवाने की।

देखता हूँ मैं खूबसूरत चेहरे यूँ तो हर रोज,
सिर्फ तुम हो मलिका-ए-हुस्न इस ज़माने की।

ये तेरा साथ साथ  चलकर करना बात मुझसे,
क्या मुझे अब भी जरूरत है तुम्हें मनाने की।

सबको नसीब होती हैं मजबूरियां ज़िन्दगी में,
हमने तो  पाई है सज़ा जहाँ में मुस्कुराने की।

वादा ला देंगें जन्नत "खामोश" तुम्हारे कदमो में,
रखेंगे लोग याद कहानी अपने आशियाने  की।
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अमित कुमार "खामोश"

सोमवार, 13 अगस्त 2018

बस गए हो तुम दिल में.........

बस गए हो तुम दिल में मेरे धड़कन की जगह।
फैल गए हो तुम फिज़ाओं में खुसबू की तरह।

काली घटा हैं गेसू, गुलबदन है हुस्न, आंखे कयामत,
हुए जो हम फना इश्क में, तुम हो इसकी वजह।

सादगी से तुम्हारा रहना, है जाता कहर बरपा,
लग जाती जो तुम्हे नजर, आईना है इसकी वजह।

करने दीदार जन्नत के, आते बहाने से तुम्हारे पास,
कौन हकदार बाहों का, करती हो तुम सबसे जिरह।

आया न होश में जो रहा "खामोश" तुम्हारे आगोश में,
दे ना पायेगा साथ मयखाना, हम हुए जो तुमसे विरह।
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अमित कुमार" खामोश"
विरह---- वियोग
जिरह----पुछताछ

रविवार, 12 अगस्त 2018

कोई बात हो तो छिपाया न करो..


कोई बात हो तो छिपाया न करो।
कोई राज दिल में दबाया न करो।

यूँ तो हर दर्द के हकीम हैं हम साकी,
सिर्फ तुम मेरे सामने आया न करो।

तुम ही हो गुनेहगार अपनी चोट के,
अपने आईने के सामने जाया न करो।

तुम मेरे पास आओ न आओ तुम्हारी मर्ज़ी,
निकलकर गली में सबको सताया न करो।

जो कहती हैं आँखे वो जुबाँ से भी कह दो,
कहेगा ज़माना आशिक़ों को आजमाया न करो।


मैं सींचता रहा खियाबां तमाम उम्र तक,
तुम तोड़कर फूल कांटा लगाया न करो।

हो जाते हैं कत्ल मासूम लोग भी देखकर,
तुम आंखों में काजल लगाया न करो।

इस कदर रोयेंगे तुम्हें पाने को "खामोश",
कहेगा फिर समुन्दर ऐसे तुम रोया न करो।

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अमित कुमार उर्फ ख़ामोश

हम थोड़े से हैं...........

www.nilkhamos.blogspot.com हम थोड़े से तो जरूर हैं तुम्हारी जिन्दगी में शामिल। वो अलग बात कि नहीं हूं बिल्कुल मैं तुम्हारे काबिल। हम ...